अवलोकन - अनुगूँज २२ - हिंदुस्तान अमरीका बन जाए तो क्या होगा - पाँच बातें

इस वक़्त सोमवार के प्रातः ०५:५१ बजे हैं और अनुगूँज का सारांश चार दिन पहले छप जाना चाहिए था। पर चक्कर यह हुआ कि एक तो मेरी कार पिछले शनिवार ११ अगस्त को चोरी हो गई - और अमेरिका की तरह अभी हिंदुस्तान में कार चोरी होने पर लोनर कार नहीं मिलती है, और इसके ऊपर आप लोगों ने तीस चालीस निबंध इस विषय पर ठोक डाले हैं पर अब सोच रहा हूँ कि शुरू कर ही देता हूँ, पूरे हफ़्ते की आपाधापी शुरू होने से पहले यानी सोमवार सुबह सात बजे के पहले यह हो जाए तो बढ़िया रहेगा।

यह अनुगूँज क्रमांक कौन सा है इस पर चर्चा हो चुकी और उसका कोई निष्कर्ष भी नहीं निकला है। तो मकान नंबर की तरह ब्रैकेट में पुराना/नया क्रमांक डाल दिया जाएगा जब फैसला हो जाए। फ़िलहाल यह २२ ही है। चलिए देखते हैं एक ही वाक्य की माला में सभी लेखकों की पुष्पलता कैसी लगती है। काफ़ी लंबा वाक्य होगा।

जीतेंद्र ने शुरुआत की अपी टोयोटा अपनी बाई को दे के - खुद शायद हमर ले बैठेंगे, उसके बाद अनुरागने अमेरिका बनने के बाद हगने की वजह से सभी पेड़ कटने की चिंता जताई, प्रेम पीयूष ने पावबीच और नानी जी की खीर - यानी खीर के डब्बे पर नानी जी लिखा वाली खीर -खिलाई, फिर आईना जी - यानी जगदीश भाटिया जी ने यह मज़ेदार समाचार बताया कि दस हज़ार की तनख्वाह दस हज़ार डॉलर(चालीस रुपए वाले) हो गई है, और हिन्दुस्तान में शांति छा गई है, मायावती और जयललिता यूट्यूब पर चुनावी बहस कर रहे हैं - एक हिंदी पेल रही हैं और दूसरी तमिल, और नीचे चिट्ठाकार लोग अनुवाद छापे जा रहे हैं, और इसके बाद कनाडे में ट्रेन में सफ़र करते हुए लड़कियों की बातें सुनते सुनते उड़न तश्तरी जी ने बातों ही बातों में यह समझा दिया कि हमारे यहाँ के आतंकवादी वैसे ही अकलमंद है तभी उन्होंने कभी किसी दफ़्तर की इमारत में बम नहीं रखा।

अब वाक्य खत्म ही करना पड़ेगा। आप भी पढ़ आए होंगे मज़ेदार वाकये। आगे चलते हैं। अमित (गुप्ता, अग्रवाल नहीं - फिर से मुआफ़ी) ने कहा कि तुम्हारा ये अनुगूँज का विषय तो ताक पर रखो, पहले आँखें खोल के देख लो कि हिंदुस्तान में क्या चल रहा है, और बाद में प्रतिदावा भी पेल दिए कि मैं तो गया ही नहीं हूँ तो यह अनुगूँज की प्रविष्टि न मानी जाए। वैसे इतनी छोटी स्कर्ट वाली गृहणियाँ तो मुझे वहाँ कोई नहीं दिखीं - अगली बार मिर्ची सेठ को खास फ़रमाइश करनी पड़ेगी। पर पंकज के श्वेत संस्करण के आधार पर मुझे लोनर कार तो क्या शायद असली गाड़ी ही दो तीन दिनों में वापस मिल जाती। वैसे भाभी जी को रसायनिक गोलियों का धन्यवाद, यह प्रविष्टि उन्हीं का फल है। आगे चलते हुए कमलेश मदान जी ने नेताओं के लिए इम्तिहान रख दिए, लेकिन उससे किसी को मतलब नहीं था, टिप्पणीकार तो इसी बात से खुश थे किसी भी बीवी या पति को दूसरे के बीवी या पति के साथ रहने-या घूमने के लिये आजादी होगी। भई मियाँ बीवी कुँवारों के साथ भी घूम सकेंगे। और खुश हो जाइए।

परमजीत बाली जी ने अपना खच्चर दौड़ाते हुए हिंदुस्तान की जनसंख्या ही २ अरब कर दी। अगर अमित के लेख को अनुगूँज का हिस्सा न मानें तो रवि रतलामी ने कीर्तिमान कायम किया पहली कार्टूनी प्रविष्टि के साथ, लेकिन ये हिलेरी की शक्ल के ऊपर क्या लिख दिया, और खाली जगह थी न आस पास। पर चलती रेलगाड़ी में बैठे अनुगूँज की पहली कार्टूनी प्रविष्टि का जटिल काम अभी भी पहली बार नहीं हुआ है। हरिमोहन सिंह जी ने कत्रीना, रीता के बाद गीता तूफ़ान खड़ा किया, और जेल से छूटते ही बिन लादेन को एमपी - नहीं सिनेटर - बना दिया। लोग और कुतुब मीनार बनवा रहे हैं ताकि वो तोड़ी जा सकें और सिनेटर बनने के सभी के सपने पूरे हो सकें। बिल्डर लोग एड्वांस बुकिंग के इश्तिहार छाप रहे हैं। ज्ञानदत्त जी ने २०९७ ईसवीं की जबलपुर की गगनचुंबी इमारतें दिखाईं, और उसके बाद आलोक पुराणिक(जिनकी वजह से मुझे आलोक-९-२-११ बुलाया जाने लगा है) जी ने टिप्पणी के अंदर अनुगूँज की प्रविष्टि छाप के - हाँ, विश्व में पहली बार - एक और कीर्तिमान स्थापित किया। अब तक ४ अगस्त हो चुकी थी - मूल अंतिम तिथि ५ अगस्त थी। काकेश ने हिंदुस्तान को अमेरिका तो बनाया ही, जिंगाड़ा, अफ़्रीका को हिंदुस्तान भी बना दिया, और वहाँ के लोगों को सत्तू भी खिला दिया। वैसे फुसफुसाहट की वजह और आवश्यकता - दोनो ही समझ नहीं आई। खैर, आगे बढ़ें। मैंने भी आखिरी दिन ही लेख लिख मारा। वैसे आखिरी दिन ही पंकज अवधिया ने खड़ी बोली में खरी खरी सुनाई, कि पहले हिंदुस्तान को हिंदुस्तान तो बनाओ।

तो ये थे वह सब लोग जिन्होंने सही तारीख तक अपने लेख लिख मारे। बहुत बढ़िया। पर आपको शायद यह गुमान न था कि अभी हिंदुस्तान अमरीका बना नहीं है। तारीख पंद्रह अगस्त तक खिंच गई। किनारे बैठे उन्मुक्त जी को बहुत गुस्सा आया - सब काम छोड़ छाड़ के उन्होंने समय पर लेख पूरा जो किया था। उन्होंने पान की पीक के अभाव में इमारतें बदसूरत दिखने पर चिंता व्यक्त की। एक सही बात जो उन्होंने कही वह थी -

अपनी बोली, भाषा और सभ्यता का महत्व बाहर जा कर ही समझ में आता है। हिंदुस्तान में तो घर की मुर्गी, साग बराबर। सारे बाहर के लोग हिंदुस्तान वापस आ जायेंगे, बाहर कोई जायगा नहीं, तब लोगों को - अपनी सम्यता, बोली, भाषा, और योग का महत्व - कैसे पता चलेगा। सब लोग कलाकारों और गायकों की तरह गिटपिट अंग्रेजी में ही बात करेंगे।

इसका प्रभाव हम हिंदी चिट्ठाकारी की शुरुआत में भी देख सकते हैं। हिंदी भाषी क्षेत्रों से बाहर रहने वालों का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। शायद तभी कहा गया है कि सैर किर दुनिया कि गाफ़िल।

बहरहाल उन्मुक्त जी को मौन-खेद व्यक्त करते हुए अनुगूँज की तिथि बढ़ा दी गई, और हेम ज्योत्सना जी ने दाल में छौंक(मेरे घर में छौंक बोलते हैं, तड़का नहीं) पर प्रतिबंध लगवा दिया, और चालीस मंजिला पार्किंग की राह भी दिखा दी। फिर पुलकित जैन जी ने विश्व में पहली बार किसी हिंदी के चिट्ठे की पहली प्रविष्टि में कविता शैली में अनुगूँज दागा, और उस पर किसी ने एक भी टिप्पणी नहीं की। यह कीर्तिमान भी दर्ज किया जाए। खुशी है कि अनुगूँज के जरिए अपने चिट्ठे की शुरुआत की। क्यों न आप ही अगला अनुगूँज आयोजित करें? आपका पुनः स्वागत है।

संजीव तिवारी ने भी विश्व में पहली बार अनुगूँज में मसिलेखन किया। उल्लेखनीय बात यह है कि उनकी लिखावट बहुत ही बढ़िया है। उन्हें मसिलेखन आउट्सोर्स किया जा सकता है। संजय पटेल जी का लेख मुझे मिला नहीं, कड़ी हो तो बता दें। अमेरिका निवासी अभिनव को पहले ही पता था कि यह अनुगूँज होगा, अतः यूनिकोड के अभाव में उन्होंने अपनी कविता रिकॉर्ड कर ली थी।

अंततः सृजनशिल्पी जी ने भी लिख ही डाला - कहा कि अनुगूँज का विषय ही गलत है।

फ़ुरसतिया जी की प्रविष्टि रद्दी कर दी गई है क्योंकि उन्होंने पाँच के बजाय दस बातें लिख दी हैं। शायद बचपन में भी गाय पर बीस पंक्तियाँ लिखते थे।

कम से कम पाँच प्रविष्टियाँ और हैं जो यहाँ उल्लिखित नहीं है - मैंने तो पढ़ी हैं पर यहाँ कड़ी नहीं है। अगर कड़ी छाप सकें तो शामिल करता हूँ।
पसीने छूट गए लिखते लिखते। देरी के लिए मुआफ़ी। हाँ, अनुगूँज खत्म होने के बाद पाँच दिन का समय देना वाजिब ही है।

11 Responses to “अवलोकन - अनुगूँज २२ - हिंदुस्तान अमरीका बन जाए तो क्या होगा - पाँच बातें”

  1. बहुत अच्छा अवलोकन किया। इतनी पोस्ट पढ़ना और अवलोकन करना मेहनत का काम है। इसीलिये पसीने भी छूट गये। कार चोरी गयी इसके लिये अफ़सोस। अभी कुछ हुआ कि नहीं! मेरी पोस्ट पढ लिये यही बहुत है। अगर शामिल करने का मन हो तो कोई पांच बिंदु अभी भी शामिल कर लें। हम बुरा नहीं मानेंगे। :)

  2. कार चोरी हो गई!! अफ़सोस व्यक्त करता हूँ.

    अनुगूँज पर तो हमने भी पहले पाँच दिनो में ही अपना लेख लिख दिया था. यहाँ शामिल होना रह गया है.

    http://www.tarakash.com/sanjay-bengani/anugunj22-bhaarat-amerika-bane.html

  3. चलिये देर आये दुरुस्त आये. कार चोरी का दुख है..कैसे हुई ये भी बतायें ताकि बांकी लोग भी सावधान रहें.

  4. इस प्रविष्टि से यह बात तो तय होती है कि आलोक 9-2-11 से 9-2-11 शैली की पोस्ट नहीं लिखवानी हो तो अनुगूंज कोई भी करे, अवलोकन आलोक 9-2-11 करें.

    रहा सवाल कार चोरी का तो हिन्दुस्तान अमरीका होता तो कार चोरी का उतना गम नहीं होता - क्योंकि बदले में तुरंत कार मिल जाती भले ही काम चलाऊ.

    एक टिप देना चाहूंगा. भारत में वाहन चोरों से बचना हो तो दो पहिया में हीरो होण्डा और चार पहिए में मारुति मत रखो. चोरों की निगाहें इन्हीं पर ज्यादा रहती हैं. :)

  5. हम भी छूट गए । वैसे इसमे गलती हमारी ही है क्यूंकि हमने शीर्षक ज़रा जल्दी मे गलत दे दिया था।वो क्या है ना कि पहली बार अनुगूंज मे भाग जो लिया था।

    कार चोरी हो जाने का दुःख है ।

  6. पहले तो कार चोरी हुई इसले लिए अफ़सोस। ब्रांड मॉडल सन्‌ वगैरह बता देना ताकि कहीं बिकती नज़र आए तो आपको बता दें।

    (गुप्ता, अग्रवाल नहीं - फिर से मुआफ़ी)

    अरे कोई बात नहीं, हो जाती है गलती। :)

    इतना पढ़ने और लिखने के लिए आभार, सभी पोस्ट न पढ़ पाने के बाद भी पता चल गया कि किसने क्या लिखा है!!

  7. बहुत बेहतरीन अवलोकन रहा, बधाई इतनी बढ़िया अनुगूँज के आयोजन के लिये.

  8. http://lavanyam-antarman.blogspot.com/2007/08/22.html

    Mera prayas bhee Dekhiyega —
    Asha hai ki aapki CAR - mil gayee hogee –

  9. आपकी कार और देश की सरकार दोनो ही खतरे मे है अभी तो। :-)

    मुझ जैसे नये-नये चिठ्ठाकार को अपने अवलोकन मे शामिल करने के लिये आभार। धन्यवाद अक्षरग्राम को भी।

  10. जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

  11. अतिउत्तम

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