देर है अंधेर नहीं

सितंबर 2005 में शशि सिंह ने “कारे कजरारे” नाम की विज्ञान फंतासी कथा “बुनो कहानी” पर शुरु की थी, एक वैज्ञानिक पिता की सांवली बेटी की दास्तां। कहानी पसंद तो की गई पर इसके बाद इसे पूरा करने का बीड़ा किसी ने नहीं उठाया। अब दो साल देर से ही सही इस कहानी को अंततः पूर्ण कर लिया गया है और इस कथा का दूसरा भाग लिखा है मीनाक्षी ने। दुबई निवासी मीनाक्षी का अपना चिट्ठा भी है। कहानी पढ़ कर लेखिका की हौसला अफज़ाई तो करें ही, तरुण और जीतू की लिखी अधूरी कहानियों को पूरा करने के दो साल इंतज़ार तो न करवायें, आप भी इन कहानियों को बुनने में हिस्सेदारी कर सकते हैं। अपने अपने ब्लॉग में तो हम सभी चिट्ठाकार लिखते ही हैं, कभी सामुदायिक चिट्ठों पर भागीदारी का भी आनंद उठायें।

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