Posted on जून 25th, 2006 द्वारा विनय
(हिंदी चिट्ठामंडल में रीडर्स डाइजेस्ट के हालिया सर्वे से शुरू हुई एक बहस चल रही है, जो इस मुद्दे से कहीं आगे तक जाती है। मैं फिलहाल बस इस सर्वे के बारे में दो-चार बातें कहना चाहता था, जो टिप्पणियों के लिए बड़ी नज़र आती हैं। इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ।)
मैनर्स या आचरण हमेशा देश-काल […]
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Posted on सितम्बर 13th, 2005 द्वारा विनय
मेरा शुरू से मानना रहा है, और समय के साथ यह धारणा दृढ़ ही हुई है, कि ब्लॉग व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के माध्यम हैं, सामूहिक विचार-विमर्श के नहीं। पर बावजूद इस तकनीकी सीमा के, अक्सर चिट्ठाकार अपने चिट्ठों के जरिये मुद्दे उठाने और उनपर बहस के लिए निमंत्रण देने से पीछे नहीं रहे हैं। और कई […]
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Posted on अप्रैल 28th, 2005 द्वारा विजय ठाकुर
आज फिर फ़ुर्सत में इंटरनेट पर टहल रहा था, एम आई टी के सर्वर पर एक भारतीय बन्धु द्वारा गीता का अनुवाद दिखा, सोचा अपने चौपाल पे भी परोसा जाए। इनका उत्साह और परिश्रम देखकर तो बड़ी खुशी हुई लेकिन हिन्दी-उर्दू अनुवाद में काफी क़सर रह गयी है, कहीं कहीं तो बिल्कुल ‘फन्न्न्नी’ सा […]
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