<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>
<!-- generator="wordpress/2.0.2" -->
<rss version="2.0" 
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	>

<channel>
	<title>अक्षरग्राम</title>
	<link>http://www.akshargram.com</link>
	<description>हिन्दी चिट्ठाकारों की चपल चौपाल</description>
	<pubDate>Fri, 29 Feb 2008 05:09:40 +0000</pubDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.0.2</generator>
	<language>en</language>
			<item>
		<title>अनुगूँज २३ - कम्प्यूटर प्रयोग - तिथि बढ़ाई गई</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2007/11/13/645/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2007/11/13/645/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 13 Nov 2007 07:26:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आलोक</dc:creator>
		
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2007/11/13/645/</guid>
		<description><![CDATA[पंकज ने घोषणा तो कर दी थी, और १५ सितंबर (२००७) की तारीख भी तय कर दी थी, लेकिन आगे कुछ हुआ ही नहीं। शायद लोग रावण जलाने, पटाखे खरीदने और कुत्ती चीज़ (यानी कंसल्टिंग) करने में लगे हुए थे। अब क्योंकि मैं इस पर लिखना चाहता हूँ, पंकज की अनुमति के साथ (जो कि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"><img alt="Akshargram Anugunj" hspace="5" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" align="right" vspace="5" border="0" /></a><a href="http://ms.pnarula.com">पंकज</a> ने <a href="http://www.akshargram.com/2007/09/02/641/">घोषणा</a> तो कर दी थी, और १५ सितंबर (२००७) की तारीख भी तय कर दी थी, लेकिन आगे कुछ हुआ ही नहीं। शायद लोग रावण जलाने, पटाखे खरीदने और कुत्ती चीज़ (यानी कंसल्टिंग) करने में लगे हुए थे। अब क्योंकि मैं इस पर लिखना चाहता हूँ, पंकज की अनुमति के साथ (जो कि माँगी नहीं गई है) इसकी तारीख ३० नवम्बर २००७ तक बढ़ा रहा हूँ। तो आप लिखें न लिंखें मेरा लिखा पढ़ ज़रूर लेना <img src='http://www.akshargram.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>टैगः <a href="http://technorati.com/tag/anugunj" rel="tag">anugunj</a>, <a href="http://technorati.com/tag/अनुगूँज" rel="tag">अनुगूँज</a></p>
<p><font size="2">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a title="अनुगूँज सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%9C">अनुगूँज</a>, <a title="anugunj सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=anugunj">anugunj</a>, </font>
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2007/11/13/645/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अनुगूँज २३ - कम्पयूटर प्रयोग</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2007/09/02/641/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2007/09/02/641/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 03 Sep 2007 01:37:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज</dc:creator>
		
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2007/09/02/641/</guid>
		<description><![CDATA[फैक्टरियों के मालिक मशीनों की असली कीमत जानते हैं। इसीलिए बहुत सी फैक्टरियों में मशीनों को पूरी तरह चालू रखने के लिए शिफ्टों में काम होता है कि मशीनें हर समय चलती रहें। कम्पयूटर भी एक मशीन ही है (वैसे देबू, अमित व जीतू शायद इसे मशीन से अधिक मानें  । समय के साथ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img align="right" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" />फैक्टरियों के मालिक मशीनों की असली कीमत जानते हैं। इसीलिए बहुत सी फैक्टरियों में मशीनों को पूरी तरह चालू रखने के लिए शिफ्टों में काम होता है कि मशीनें हर समय चलती रहें। कम्पयूटर भी एक मशीन ही है (वैसे देबू, अमित व जीतू शायद इसे मशीन से अधिक मानें <img src='http://www.akshargram.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> । समय के साथ साथ कम्पयूटर हर जगह नजर आने लगा है। पर आपने मानेंगे कि बहुत बार कम्पयूटर लिया तो चाव से जाता है पर फिर यह काफी समय धूल चाटता रहता है। तो भाईयो, बहनों व भाभियों इस अनुगूँज के द्वारा आप बताइए कि आप कम्पयूटर का घर पर किस प्रकार से प्रयोग करते हैं? आप अपनी सोच कि कम्पयूटर का ऐसे प्रयोग होना चाहिए पर भी लिख सकते हैं। इस प्रकार से आप सभी के द्वारा लिखे लगे लेखों से मुझे पूरा विश्वास है कि सभी को कम्पयटूर के नए प्रयोगों के बारे में पता चलेगा। तो देर किस बात की है उठाइए अपनी कलम अरर.. कीबोर्ड और लिख डालिए अपने कम्पयूटर प्रयोग के बारे में। अपने दोस्तों को इस अनुगूंज में शामिल होने के लिए उत्साहित करें तो और भी बढ़िया। इस अनुगूंज की अंतिम तिथि है <strong>सितम्बर 15, 2007</strong>.</p>
<p>अनुगूँज में लिखने के लिए सभी आमंत्रित हैं। इस के नियमों के बारे में <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj">यहाँ पढ़ें </a>और अपने ब्लॉग पर लिखी प्रविष्टि में अनुगूंज का लोगो लगाना न भूलें</p>
<p>- मिर्ची सेठ
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2007/09/02/641/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अवलोकन - अनुगूँज २२ - हिंदुस्तान अमरीका बन जाए तो क्या होगा - पाँच बातें</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2007/08/19/639/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2007/08/19/639/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 20 Aug 2007 01:51:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आलोक</dc:creator>
		
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2007/08/19/639/</guid>
		<description><![CDATA[इस वक़्त सोमवार के प्रातः ०५:५१ बजे हैं और अनुगूँज का सारांश चार दिन पहले छप जाना चाहिए था। पर चक्कर यह हुआ कि एक तो मेरी कार पिछले शनिवार ११ अगस्त को चोरी हो गई - और अमेरिका की तरह अभी हिंदुस्तान में कार चोरी होने पर लोनर कार  नहीं मिलती है, और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>इस वक़्त सोमवार के प्रातः ०५:५१ बजे हैं और अनुगूँज का सारांश चार दिन पहले छप जाना चाहिए था। पर चक्कर यह हुआ कि एक तो मेरी कार पिछले शनिवार ११ अगस्त को चोरी हो गई - और अमेरिका की तरह अभी हिंदुस्तान में कार चोरी होने पर <a href="http://www.eastbaybmw.com/partsservice/Loancar.jsp?ptitle=Loaner%20Car%20Policy">लोनर कार</a>  नहीं मिलती है, और इसके ऊपर आप लोगों ने तीस चालीस निबंध इस विषय पर ठोक डाले हैं पर अब सोच रहा हूँ कि शुरू कर ही देता हूँ, पूरे हफ़्ते की आपाधापी शुरू होने से पहले यानी सोमवार सुबह सात बजे के पहले यह हो जाए तो बढ़िया रहेगा। </p>
<p>यह अनुगूँज क्रमांक कौन सा है इस पर चर्चा हो चुकी और उसका कोई निष्कर्ष भी नहीं निकला है। तो मकान नंबर की तरह ब्रैकेट में पुराना/नया क्रमांक डाल दिया जाएगा जब फैसला हो जाए। फ़िलहाल यह २२ ही है। चलिए देखते हैं एक ही वाक्य की माला में सभी लेखकों की पुष्पलता कैसी लगती है। काफ़ी लंबा वाक्य होगा। </p>
<p><a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=749">जीतेंद्र</a> ने शुरुआत की अपी टोयोटा अपनी बाई को दे के - खुद शायद हमर ले बैठेंगे, उसके बाद <a href="http://pagdandi1.blogspot.com/2007/08/22.html">अनुराग</a>ने अमेरिका बनने के बाद हगने की वजह से सभी पेड़ कटने की चिंता जताई, <a href="http://prempiyushhindi.wordpress.com/2007/08/02/अनुगूँज-22-हिन्दुस्तान-अमर/">प्रेम पीयूष</a> ने पावबीच और नानी जी की खीर - यानी खीर के डब्बे पर नानी जी लिखा वाली खीर -खिलाई, फिर आईना जी - यानी <a href="http://aaina2.wordpress.com/2007/08/02/anugunj/">जगदीश भाटिया</a> जी ने यह मज़ेदार समाचार बताया कि दस हज़ार की तनख्वाह दस हज़ार डॉलर(चालीस रुपए वाले) हो गई है, और हिन्दुस्तान में शांति छा गई है, मायावती और जयललिता यूट्यूब पर चुनावी बहस कर रहे हैं - एक हिंदी पेल रही हैं और दूसरी तमिल, और नीचे चिट्ठाकार लोग अनुवाद छापे जा रहे हैं, और इसके बाद कनाडे में ट्रेन में सफ़र करते हुए लड़कियों की बातें सुनते सुनते <a href="http://udantashtari.blogspot.com/2007/08/blog-post_03.html">उड़न तश्तरी</a> जी ने बातों ही बातों में यह समझा दिया कि हमारे यहाँ के आतंकवादी वैसे ही अकलमंद है तभी उन्होंने कभी किसी दफ़्तर की इमारत में बम नहीं रखा।</p>
<p>अब वाक्य खत्म ही करना पड़ेगा। आप भी पढ़ आए होंगे मज़ेदार वाकये। आगे चलते हैं। <a href="http://itsme.wordpress.com/2007/08/03/america-america-america/">अमित</a> (गुप्ता, अग्रवाल नहीं - फिर से मुआफ़ी) ने कहा कि तुम्हारा ये अनुगूँज का विषय तो ताक पर रखो, पहले आँखें खोल के देख लो कि हिंदुस्तान में क्या चल रहा है, और बाद में प्रतिदावा भी पेल दिए कि मैं तो गया ही नहीं हूँ तो यह अनुगूँज की प्रविष्टि न मानी जाए। वैसे इतनी छोटी स्कर्ट वाली गृहणियाँ तो मुझे वहाँ कोई नहीं दिखीं - अगली बार <a href="http://ms.pnarula.com/200708/यदि-भारत-अमरीका-हो-जाए-तो-श/">मिर्ची सेठ</a> को खास फ़रमाइश करनी पड़ेगी। पर पंकज के श्वेत संस्करण के आधार पर मुझे लोनर कार तो क्या शायद असली गाड़ी ही दो तीन दिनों में वापस मिल जाती। वैसे भाभी जी को रसायनिक गोलियों का धन्यवाद, यह प्रविष्टि उन्हीं का फल है। आगे चलते हुए <a href="http://sunobhai.blogspot.com/2007/08/22.html">कमलेश मदान</a> जी ने नेताओं के लिए इम्तिहान रख दिए, लेकिन उससे किसी को मतलब नहीं था, टिप्पणीकार तो इसी बात से खुश थे किसी भी बीवी या पति को दूसरे के बीवी या पति के साथ रहने-या घूमने के लिये आजादी होगी। भई मियाँ बीवी कुँवारों के साथ भी घूम सकेंगे। और खुश हो जाइए। </p>
<p><a href="http://paramjitbali-ps2b.blogspot.com/2007/08/blog-post_03.html">परमजीत बाली</a> जी ने अपना खच्चर दौड़ाते हुए हिंदुस्तान की जनसंख्या ही २ अरब कर दी। अगर अमित के लेख को अनुगूँज का हिस्सा न मानें तो <a href="http://desitoons.wordpress.com/2007/08/04/when-india-becomes-america/">रवि रतलामी</a> ने कीर्तिमान कायम किया पहली कार्टूनी प्रविष्टि के साथ, लेकिन ये हिलेरी की शक्ल के ऊपर क्या लिख दिया, और खाली जगह थी न आस पास। पर चलती रेलगाड़ी में बैठे अनुगूँज की पहली कार्टूनी प्रविष्टि का जटिल काम अभी भी पहली बार नहीं हुआ है। <a href="http://aaisi-ki-taisi.blogspot.com/2007/08/blog-post.html">हरिमोहन सिंह</a> जी ने कत्रीना, रीता के बाद गीता तूफ़ान खड़ा किया, और जेल से छूटते ही बिन लादेन को एमपी - नहीं सिनेटर - बना दिया। लोग और कुतुब मीनार बनवा रहे हैं ताकि वो तोड़ी जा सकें और सिनेटर बनने के सभी के सपने पूरे हो सकें। बिल्डर लोग एड्वांस बुकिंग के इश्तिहार छाप रहे हैं। <a href="http://hgdp.blogspot.com/2007/08/2097-22.html">ज्ञानदत्त</a> जी ने २०९७ ईसवीं की जबलपुर की गगनचुंबी इमारतें दिखाईं, और उसके बाद <a href="http://hgdp.blogspot.com/2007/08/2097-22.html#comment-3621632751783964308">आलोक पुराणिक</a>(जिनकी वजह से मुझे आलोक-९-२-११ बुलाया जाने लगा है) जी ने टिप्पणी के अंदर अनुगूँज की प्रविष्टि छाप के - हाँ, विश्व में पहली बार - एक और कीर्तिमान स्थापित किया। अब तक ४ अगस्त हो चुकी थी - मूल अंतिम तिथि ५ अगस्त थी। <a href="http://kakesh.wordpress.com/2007/08/05/if-india-become-america/">काकेश</a> ने हिंदुस्तान को अमेरिका तो बनाया ही, जिंगाड़ा, अफ़्रीका को हिंदुस्तान भी बना दिया, और वहाँ के लोगों को सत्तू भी खिला दिया। वैसे फुसफुसाहट की वजह और आवश्यकता - दोनो ही समझ नहीं आई। खैर, आगे बढ़ें। मैंने भी आखिरी दिन ही <a href="http://alok.livejournal.com/13439.html">लेख लिख मारा</a>। वैसे आखिरी दिन ही <a href="http://dardhindustani.blogspot.com/2007/08/blog-post_9222.html">पंकज अवधिया</a> ने खड़ी बोली में खरी खरी सुनाई, कि पहले हिंदुस्तान को हिंदुस्तान तो बनाओ। </p>
<p>तो ये थे वह सब लोग जिन्होंने सही तारीख तक अपने लेख लिख मारे। बहुत बढ़िया। पर आपको शायद यह गुमान न था कि अभी हिंदुस्तान अमरीका बना नहीं है। तारीख पंद्रह अगस्त तक खिंच गई। किनारे बैठे <a href="http://unmukts.wordpress.com/2007/08/06/anugoonj-22/">उन्मुक्त</a> जी को बहुत गुस्सा आया - सब काम छोड़ छाड़ के उन्होंने समय पर लेख पूरा जो किया था। उन्होंने पान की पीक के अभाव में इमारतें बदसूरत दिखने पर चिंता व्यक्त की। एक सही बात जो उन्होंने कही वह थी - </p>
<blockquote><p>
अपनी बोली, भाषा और सभ्यता का महत्व बाहर जा कर ही समझ में आता है। हिंदुस्तान में तो घर की मुर्गी, साग बराबर। सारे बाहर के लोग हिंदुस्तान वापस आ जायेंगे, बाहर कोई जायगा नहीं, तब लोगों को - अपनी सम्यता, बोली, भाषा, और योग का महत्व - कैसे पता चलेगा। सब लोग कलाकारों और गायकों की तरह गिटपिट अंग्रेजी में ही बात करेंगे।
</p></blockquote>
<p>इसका प्रभाव हम हिंदी चिट्ठाकारी की शुरुआत में भी देख सकते हैं। हिंदी भाषी क्षेत्रों से बाहर रहने वालों का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। शायद तभी कहा गया है कि सैर किर दुनिया कि गाफ़िल।</p>
<p>बहरहाल उन्मुक्त जी को मौन-खेद व्यक्त करते हुए अनुगूँज की तिथि बढ़ा दी गई, और <a href="http://hemjyotsana.wordpress.com/2007/08/07/अनुगूँज-22-हिन्दुस्तान-अमर/">हेम ज्योत्सना</a> जी ने दाल में छौंक(मेरे घर में छौंक बोलते हैं, तड़का नहीं) पर प्रतिबंध लगवा दिया, और चालीस मंजिला पार्किंग की राह भी दिखा दी। फिर <a href="http://pulkitj.blogspot.com/2007/08/blog-post.html">पुलकित जैन</a> जी ने विश्व में पहली बार किसी हिंदी के चिट्ठे की पहली प्रविष्टि में कविता शैली में अनुगूँज दागा, और उस पर किसी ने एक भी टिप्पणी नहीं की। यह कीर्तिमान भी दर्ज किया जाए। खुशी है कि अनुगूँज के जरिए अपने चिट्ठे की शुरुआत की। क्यों न आप ही अगला अनुगूँज आयोजित करें? आपका पुनः स्वागत है।</p>
<p><a href="http://aarambha.blogspot.com/2007/08/blog-post_10.html">संजीव तिवारी</a> ने भी विश्व में पहली बार अनुगूँज में मसिलेखन किया। उल्लेखनीय बात यह है कि उनकी लिखावट बहुत ही बढ़िया है। उन्हें मसिलेखन आउट्सोर्स किया जा सकता है। <a href="http://www.joglikhisanjaypatelki.blogspot.com/">संजय पटेल</a> जी का लेख मुझे मिला नहीं, कड़ी हो तो बता दें। अमेरिका निवासी <a href="http://ninaaad.blogspot.com/2007/08/blog-post_13.html">अभिनव</a> को पहले ही पता था कि यह अनुगूँज होगा, अतः यूनिकोड के अभाव में उन्होंने अपनी कविता रिकॉर्ड कर ली थी।</p>
<p>अंततः <a href=http://srijanshilpi.com/?p=133">सृजनशिल्पी जी</a> ने भी लिख ही डाला - कहा कि अनुगूँज का विषय ही गलत है।</p>
<p><a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=315">फ़ुरसतिया जी</a> की प्रविष्टि रद्दी कर दी गई है क्योंकि उन्होंने पाँच के बजाय दस बातें लिख दी हैं। शायद बचपन में भी गाय पर बीस पंक्तियाँ लिखते थे।</p>
<p>कम से कम पाँच प्रविष्टियाँ और हैं जो यहाँ उल्लिखित नहीं है - मैंने तो पढ़ी हैं पर यहाँ कड़ी नहीं है। अगर कड़ी छाप सकें तो शामिल करता हूँ।<br />
पसीने छूट गए लिखते लिखते। देरी के लिए मुआफ़ी। हाँ, अनुगूँज खत्म होने के बाद पाँच दिन का समय देना वाजिब ही है।
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2007/08/19/639/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अनुगूँज २२ - पन्द्रह अगस्त तक जारी</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2007/08/05/638/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2007/08/05/638/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 05 Aug 2007 21:17:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आलोक</dc:creator>
		
	<category>विविध</category>
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2007/08/05/638/</guid>
		<description><![CDATA[चूँकि अभी तक हिन्दुस्तान अमरीका नहीं बना है, अनुगूँज २२ की तिथि पन्द्रह अगस्त तक बढ़ा दी गई है। तो, लिखें। कई बन्धुओं-भगिनयों को अनुगूँज की छवि का कूट नहीं मिला, सो यहाँ है - वही जो a href से शुरू हो रहा है, ऊपर वाला। यह अपने लेख के शुरू में लगा दें। और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>चूँकि अभी तक <a href="http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/">हिन्दुस्तान अमरीका नहीं बना है</a>, अनुगूँज २२ की तिथि पन्द्रह अगस्त तक बढ़ा दी गई है। तो, लिखें। कई बन्धुओं-भगिनयों को अनुगूँज की छवि का कूट नहीं मिला, <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj">सो यहाँ है</a> - वही जो a href से शुरू हो रहा है, ऊपर वाला। यह अपने लेख के शुरू में लगा दें। और नीचे वाला, जो a href से शुरू हो रहा है, उसे अपने लेख के अन्त में लगा दें।<br />
यह अनुगूँज बाईसवाँ है या चौबीसवाँ, अभी भी रहस्य है क्योंकि विगत अनुगूँज आयोजनों की सूची में २१ का ही उल्लेख है। खोजबीन जारी है।  अब तक दस से अधिक लेख छप चुके हैं, सबको धन्यवाद। याद रहे कि अनुगूँज घोषित कोई भी कर सकता है, अगले पखवारे के लिए विषय व घोषणा अभी से की जा सकती है। तो विषय सोचिए, और इस बार के अनुगूँज के लिए लिखते समय हास्य रस कतई न भूलें <img src='http://www.akshargram.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  सारांश १६ अगस्त को छपेगा।
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2007/08/05/638/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अनुगूँज 22: हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा - पाँच बातें</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 01 Aug 2007 05:38:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आलोक</dc:creator>
		
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/</guid>
		<description><![CDATA[ आप सबसे अनुरोध है कि इस विषय पर लिखें - पाँच तारीख तक का समय है। यानी - आज, 1 अगस्त से लेकर पाँच अगस्त तक। हास्य रस का जम कर इस्तेमाल करें, आजकल चिट्ठों की दुनिया में वैसे ही गम्भीर विषयों पर लगातार चर्चा हो रही है।प्रविष्टि लिख कर यहाँ टिप्पणी में कड़ी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"><img alt="Akshargram Anugunj" hspace="5" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" align="right" vspace="5" border="0" /></a> आप सबसे अनुरोध है कि इस विषय पर लिखें - पाँच तारीख तक का समय है। यानी - आज, 1 अगस्त से लेकर पाँच अगस्त तक। हास्य रस का जम कर इस्तेमाल करें, आजकल चिट्ठों की दुनिया में वैसे ही गम्भीर विषयों पर लगातार चर्चा हो रही है।प्रविष्टि लिख कर यहाँ टिप्पणी में कड़ी दे दें या अपने लेख में इस लेख की कड़ी दे दें, स्वतः हमें पता चल जाएगा कि आपने कुछ लिखा है। अनुगूँज की तस्वीर लगाना न भूलें, यह आपको मिलेगी <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj">अनुगूँज पृष्ठ पर</a> और अनुगूँज के अन्य नियम भी। छः तारीख को सभी प्रविष्टियों का सारांश प्रकाशित होगा, अतः जल्दी करें।</p>
<p>और घबराइए मत, बेधड़क लिखिए, आपको मालूम होना चाहिए कि हम आपसे भी बुरा लिखते हैं। फिर से याद दिला रहा हूँ - हास्य रस न भूलें! <img src='http://www.akshargram.com/chittha/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2007/08/01/637/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अवलोकन अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2007/04/08/619/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2007/04/08/619/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 09 Apr 2007 00:58:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>tarun</dc:creator>
		
	<category>विविध</category>
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2007/04/08/619/</guid>
		<description><![CDATA[इस बार के अनुगूँज की प्रविष्टियां देख कर हमें यही कहना पड़ेगा कि बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। कुल जमा तीन प्रविष्टियां, वो तो भला हो आशीष और जीतू का जिन्होंने क्रिकेट की अंतिम जोडी की तरह कुछ तो खाता आगे बढाया वरना अपने कागज के शेर (धूरंधर पूराने शातिर हिन्दी चिट्ठाकार) [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.akshargram.com/2007/02/26/615/">इस बार के अनुगूँज</a> की प्रविष्टियां देख कर हमें यही कहना पड़ेगा कि <strong>बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले</strong>। कुल जमा तीन प्रविष्टियां, वो तो भला हो आशीष और जीतू का जिन्होंने क्रिकेट की अंतिम जोडी की तरह कुछ तो खाता आगे बढाया वरना अपने कागज के शेर (<em>धूरंधर <del datetime="2007-04-09T01:33:08+00:00">पूराने</del> शातिर हिन्दी चिट्ठाकार</em>) भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों की ही कहानी एक बार फिर दोहरा गये। इनकी तुलना आप भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों से अक्षरशः कर सकते हैं, <img src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="Akshargram Anugunj" align="right" hspace="5" vspace="5" /> उनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू और इनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू, वो भी बडे (ग्रुप) आयोजन में टांय टांय फुस्स और ये भी ऐसे आयोजन से नदारद। मध्यम क्रम के चिट्ठाकार एक दूसरे की पीठ खुजाने में व्यस्त थे तो यहाँ खाता कहाँ से खोलते। हमने गलती करी की अपनी आधी से ज्यादा बात उदघोषणा के वक्त कह दी और थोडी अवलोकन के लिये बचा के रख दी। हमें अगर पता होता कि कोई मैदान में ही नही उतरेगा तो बजाय घोषणा में कहने के अलग से चेप देते। मोहल्ले की टीम के कप्तान ने भी हमारी <a href="http://www.readers-cafe.net/nc/?p=134">किसी पोस्ट में टिप्पणी</a> करके पूछा था घरेलू श्रृखंला (धर्म की बहस) के अलावा भी कोई टूर्नामेंट होता है तो हमें बताओ हम भी खेलेंगे, हमने भी तुरंत मौका लपकने की गरज से इस आस्कर वाले आयोजन का पता बता दिया लेकिन वो अपनी कथनी को करनी में बदल नही पाये और घरेलू श्रखंला में ही व्यस्त हो कर रह गये। यानि कि कुल मिलाकर इस आयोजन का भी कुछ कुछ वैसा ही हाल हो गया जैसा कि इस बार के क्रिकेट महाकुंभ का। चलिये अब अनुगूँज नामक इस आयोजन को अपना आखिर सलाम कहने से पहले अब तक की कहासुनी (या बतकही) का कुछ अवलोकन कर दें।</p>
<p>इस अनुगूँज की घोषणा करते ही सबसे पहले बाउंड्री मारी <strong>लावण्या जी</strong> ने, एक एक सवाल का कुशलता से जवाब देती गयीं। उन्होने <strong>शुरूआत करी कुछ ऐसे </strong>- &#8221; उत्तर अमरीका मेँ रहती अवश्य हूँ परँतु, फिर भी मेरा अवलोकन व मत सर्वथा, &#8220;निष्पक्ष &#8221; है&#8221;, उनका आगे कहना था कि &#8220;अगर भारतीय फिल्म ऐसी हो, जो भारत को दकियानूसी, रुढीवादी , पुरातनपँथी बता रही हो, जैसे दीपा मेहता जी की,&#8221;वोटर&#8221; या (सत्यजीत रे की पुरानी फील्म, &#8221; पाथेर पँचाली&#8221; तो, उसे अवश्य &#8220;तेज केँद्र मेँ चुँधियाती रोशनी &#8221; = मतलब &#8221; लाइम लाईट&#8221; मेँ खडा कर के ऐवोर्ड से नवाजा जाता रहा है&#8221;। अब ये अलग बात है कि ये वाटर भारत में तुरंत नही बरसा या यूँ कहें कि उसे गंदगी बहा ले जाने के डर से बहने नही दिया गया। </p>
<p>उनका ये भी <strong>मानना है कि</strong> &#8220;अमरीकन &#8221; छाया चित्रोँ &#8221; = ( फिल्मोँ ) पर यहूदी कौम की गहरी पकड है &#8212; दूसरी यूरोप की कई नस्लेँ, जातियाँ भी प्रतिनिधित्व रखतीँ हैँ -ज्यादातर, वे जुडाओ, क्रिस्चीयन, ऐँग्लो ~ सेक्सकन, प्रोटेस्टेँट प्रणाली से सँबँधित होते हैँ -और उन्हीँ का वर्चस्व रहे, उनके विचारोँ का बाहुल्य, व बहुमत रहे उस बारे मेँ वे सजग व, प्रयत्नशील रहते हैँ -इस दशा मेँ &#8221; भारत को बहोत ज्यादा ऊँचाई मिले &#8221; = ग्लैमरस &#8221; वैसी छवि दीखलाने मेँ उन्हेँ क्यूँ रस रहेगा? &#8221; साथ ही सवाल भी उठाया, &#8220;इन सरी बातॉम मेँ &#8221; होलीवुड&#8221; सिध्ध हस्त&#8221; है &#8212; बिलकुल उसी तरह जैसे - भारत , सदीयोँ से, कई सारे शुध्ध इत्तर का निकास करता आया है परँतु, जो वित्तीय व व्यापारीक सफलता फ्रान्स ने हासिल की है, पर्फुम बन्नने व उन्हेँ बेचकर अबजोँ की तादाद मेँ नफा कमाने की, वो भारत क्यूँ हासिल नहीँ कर पाया आज तक? पेरिस मेँ बनी इत्र की शीशीयोँ मेँ नकली इत्र भरकर बेचने से मुनाफा कमाने की नकलची बँदर वाली हमारी सोच हम क्यूँ नहीँ बदल सके ??&#8221;</p>
<p>इतना सब कुछ कहने के बाद इनको आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि </p>
<blockquote><p>&#8220;मुझे अचरज इसी बात का है कि, भारत का हर क्षेत्र क्यूँ &#8220;अमरीकन समाज प्रणाली &#8221; का अँधा अनुकरण कर, अपने को &#8221; आधुनिक&#8221; कहलवाने की कोशिश मेँ लगा, ये भूल रहा है कि, भारत दुनिया के पूर्वी गोलार्ध मेँ है जहाँ से सूर्य पस्चिम गोलार्ध को प्रकाशित करता है।&#8221;</p></blockquote>
<p>इनकी कही उन तमाम बातों को विस्तार से आप <a href="http://antarman-antarman.blogspot.com/">यहाँ पढ सकते</a> हैं। </p>
<p><strong>आशीष</strong> ने तो शुरूआत ही आंकड़े देते हुए करी, उन्होने बताया &#8220;भारतीय फिल्म उद्योग विश्व फिल्म उद्योग मे हॉलीवुड के बाद दूसरे नम्बर पर आता है&#8221;। उन्होंने पहले सवाल उठाया, &#8220;लेकिन क्या आपको अपनी श्रेष्ठता का प्रचार करना आता है ? लगान, जब ऑस्कर के अंतिम चरण तक पहुंची थी, उसमे फिल्म की श्रेष्ठता के अलावा ,उसके प्रचार का  भी योगदान था।&#8221; </p>
<p>आशीष का ये भी मानना है कि हम &#8220;भारतीय फ़िल्मो को दो श्रेणीयो मे रख सकते है, व्यावसायिक और कला फ़िल्मे।&#8221; और ये काफी हद तक माना भी जा सकता है लेकिन इसमें क्षेत्रीय फिल्में छूट ही जाती हैं। क्षेत्रीय फिल्मों की बात चली है तो पहले आशीष की कही एक बात कहूँ फिर आगे बात करता हूँ, आशीष का कहना था कि &#8220;इस वजह से यह पुरस्कार विदेशी भाषा श्रेणी को छोड़कर अन्य श्रेणीयो मे अंग्रेजी फिल्मों के लिये ऑस्कर पुरस्कार बन कर रह गया है।&#8221;। अब सवाल ये है कि भारत में भी तो ज्यादातर फिल्म समारोह हिन्दी सिनेमा के लिये पुरस्कार बनकर रह गये हैं, क्षेत्रीय फिल्मों को सिर्फ राष्ट्रीय पुरस्कारों में जगह मिल पाती है और वहाँ हिन्दी फिल्मों को पुरस्कार पाने के लिये संघर्ष करना पड़ता है।</p>
<p>आशीष ने अभिनय, तकनीक और निर्देशकों की क्षमता जहाँ सवाल उठाये वहीं संगीत की थोडी तारीफ भी करी लेकिन ये भी पीछे से जोडते गये कि यही संगीत पुरस्कार पाने की राह का एक रोडा भी है। कला फिल्मों से पूरी तरह प्रभावित आशीष का कहना था, </p>
<blockquote><p>&#8220;कला फ़िल्मो के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इन्हे देखने के लिये भारत मे ही दर्शक नही मिलते है। जब दर्शक नही तो पैसे नही, पैसा नही तो ऑस्कर के लिये फिल्म नामित कैसे हो। नामित हो भी गयी तो प्रसार प्रचार के लिये पैसा कंहा से आयेगा ? भारतीय कला फ़िल्मे अभिनय, निर्देशन और संगीत के क्षेत्र मे किसी से कम नही है।&#8221;</p></blockquote>
<p>बात में वजन भी था क्योंकि ये बात वाकई में सत्य भी थी। </p>
<p>वैसे आशीष ने तो इसे वर्ष की त्रासदी कहा लेकिन हमें लगता है ये अब तक की त्रासदी है, &#8220;इस वर्ष की त्रासदी यह रही कि एक बेहतरीन फिल्म &#8216;वाटर&#8217; को अपने ही देश से नामित नही किया गया, उसे एक दूसरे देश &#8216;कनाडा&#8217; से नामित होना पड़ा।&#8221;  आशीष ने समापन किया यह कह कर &#8220;यदि भारतीय फ़िल्मो को ऑस्कर जितने की उम्मीद रखना है तो इस उद्योग मे आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। मौजूदा परिस्थिति मे ऑस्कर जितना एक दिवास्वप्न से ज्यादा और कुछ नही है।&#8221; इनकी कही उन तमाम बातों को विस्तार से <a href="http://www.hindigram.org/index.php?option=com_content&#038;task=view&#038;id=19&#038;Itemid=9">आप यहाँ पढ सकते</a> हैं।</p>
<p><strong>जीतू</strong> की कही बातों पर कुछ कहने से पहले तो मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने पारिवारिक समस्या के चलते भी समय निकाल के अपना योगदान दिया। जीतू ने भी शुरूआत आस्कर की भूमिका देने से करी, &#8220;<a href="http://www.oscars.org/index.html">ऑस्कर अवार्ड</a> जिन्हे एकाडमी अवार्ड भी कहा जाता है विश्व मे फिल्मी दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। १९२९ मे शुरु हुए इन पुरस्कारों मे सर्वश्रेष्ठ चलचित्र (फिल्म) को पुरस्कार दिया जाता है। शुरु शुरु मे विजेता फिल्मों की घोषणा सार्वजनिक रुप से की जाती थी, लेकिन १९४० के बाद से बाकायदा नामांकन प्रक्रिया को अपनाया जाता है, तो विजेताओं की घोषणा आखिरी वक्त में मंच पर की जाती है।&#8221;</p>
<p>जीतू का मानना यही है कि पश्चिम अभी भी भारत को लेकर अपने पूर्वाग्रहों से ग्रसित है, &#8220;मेरे विचार से अव्वल तो ये फिल्में सिर्फ़ एक वर्ग विश्व सिनेमा वाले वर्ग मे नामित होती है, जहाँ पर सिनेमा के कई पहलुओं को ध्यान मे रखकर फिल्म चयनित की जाती है। और दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पश्चिमी लोगों का भारत के प्रति रवैया। </p>
<blockquote><p>उन्हे भारतीय फिल्मों मे गरीब किसान, फटेहाल नायक, साधू, मदारी ज्यादा पसन्द आते है। उनकी नज़रों मे तो भारत अभी भी साधू और मदारियों का देश है।</p></blockquote>
<p>यदि हम अपने सिनेमा मे भारत की खुशहाली को दिखाते है तो वे शायद इसे कल्पना की उड़ान मानते है। अब थोड़ा बहुत तो बदलाव आया है, लेकिन अभी भी पूर्वाग्रह तो है ही।&#8221; इनकी कही उन तमाम बातों को विस्तार से <a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=693">आप यहाँ पढ सकते</a> हैं।</p>
<p>सारांश यही है कि तीनों का मानना था कि पुरस्कार पाने के लिये कुछ परिवर्तन तो करने ही पड़ेंगे। ये तो हर क्षेत्र में करना पड़ता है अब देखिये आउटसोर्सिंग को भारत में पनपने देने के लिये भी कुछ बदलाव किये। ये तो भारतीय फिल्म उधोग को सोचना ही होगा कि कहानी के बीच में बिन बुलाय मेहमान से टपकते गीत भारत को छोड कही नही चलने वाले, वैसे भी आस्कर को भेजे जाने वाले प्रिंट में से अगर गाने काट दिये जायें तो फिल्म की कहानी में कोई फर्क नही पड़ने वाला। अब अपने भारतीये उधोग के ये लोग चाहें कितना भी कह लें कि इनका आस्कर के लिये कोई लालच नही लेकिन सभी अपनी फिल्मों को आस्कर की दौड़ में भेजने के लिये तत्पर रहते हैं। मेरा तो यही मानना है कि अगर हम क्षेत्रीय फिल्मों को आस्कर में भेज उसके प्रचार के लिये मिलकर आयें तो उन फिल्मों के पुरस्कार प्राप्त करने की ज्यादा संभावनायें हैं।</p>
<p>आस्कर और बालीवुड को लेकर ही ज्यादा कहा गया, हिन्दी का फिल्मों से लिंक को लेकर बहुत कम कहा गया। हिंदी के विश्व में योगदान के लिये भी आस्कर महत्वपूर्ण हो जाता है। कोई माने या ना माने, लेकिन स्पेनिश और इटेलियन भाषा के प्रचार में थोडा बहुत सहयोग उन भाषा पर बनी फिल्मों का आस्कर में सफल होना भी है। मैने ४-५ आस्कर में सम्मानित दूसरी भाषाओं की फिल्में देखी हैं और ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि उन फिल्मों को समझने के लिये भाषा का जानकार होना बिल्कुल भी जरूरी नही। लेकिन बार बार उस भाषा की फिल्में देखने से थोडी बहुत समझ में आने भी लगती है। </p>
<p>अब चलते चलते दो फिल्मों का उल्लेख कर दूँ, अगर कभी आपको मौका मिले तो देखियेगा जरूर - पहली है इटेलियन फिल्म &#8220;<a href="http://www.imdb.com/title/tt0118799/">लाइफ एज ब्यूटिफूल</a>&#8221; और दूसरी है &#8220;<a href="http://www.imdb.com/title/tt0283509/">नो मैनस लैंड</a>&#8220;।</p>
<p><strong>नोटः</strong> वैसे तो हमें उम्मीद नही है लेकिन फिर भी अगर किसी की प्रविष्टी रह गयी हो तो सूचित करे उसके खाते के रन भी टीम के स्कोर में जोड दिये जायेंगे</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2007/04/08/619/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2007/02/26/615/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2007/02/26/615/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 27 Feb 2007 04:46:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>tarun</dc:creator>
		
	<category>विविध</category>
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2007/02/26/615/</guid>
		<description><![CDATA[आजकल चिट्ठे नही पढ पा रहा हूँ लेकिन कुछ दिनों पहले तक देखा लगभग सभी चिट्ठाकार बडे उत्साहित  ( या किसी और कारणवश, पता चलते ही सरेआम बता दिया जायेगा) होकर टैग होने के बाद पांच सवालों के जवाब दे रहे थे। क्या नये क्या पुराने सभी चिट्ठाकारों ने इन सवालों के जवाब दिये। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आजकल चिट्ठे नही पढ पा रहा हूँ लेकिन कुछ दिनों पहले तक देखा लगभग सभी चिट्ठाकार बडे उत्साहित <img align="right" alt="Akshargram Anugunj" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" /> ( या किसी और कारणवश, पता चलते ही सरेआम बता दिया जायेगा) होकर टैग होने के बाद पांच सवालों के जवाब दे रहे थे। क्या नये क्या पुराने सभी चिट्ठाकारों ने इन सवालों के जवाब दिये। मुझे एक बार फिर से अनुगूँज का कुछ भविष्य नजर आया, सोचा क्यों ना एक बार और कोशिश करके देखी जाय। तो साथियों पेश है अनुगूँज 23 अपने विषय के साथ - आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड ( या आखिर भारतीय फिल्मों के आस्कॅर में असफल होने की वजह क्या है) । आप इन दोनों में से कोई भी विषय रख सकते हैं।</p>
<p>अभी अभी फिल्मों के मशहूर अवार्ड आस्कॅर समारोह का समापन हुआ, इस बार भी इस समारोह में विदेशी फिल्मो की श्रेणी में एक हिन्दी फिल्म शामिल थी। ये अलग अफसोस की बात है कि ये कनाडा का प्रतिनिधित्व कर रही थी। अंत में ये फिल्म भी अन्य हिंदी फिल्मों की तरह अंत में मात खा गयी, इस बार मात दी जर्मनी की फिल्म ने। वहीं इस बार के आस्कॅर की एक खास बात ये थी कि इसमें मैक्सिको की काफी फिल्में (स्पेनिश भाषा) अलग अलग श्रेणियों में शामिल थी। आखिर क्या वजह है कि हिन्दी को छोड के लगभग सभी अन्य भाषाओं (मुख्य) की फिल्में आस्कॅर में अपने पहुँच बडाती जा रही है। भारतीय फिल्म उधोग विश्व में दूसरे नंबर पर तो आता ही है फिर क्या वजह है कि ये आस्कॅर में कहीं नही टिकता। इन भारतीय फिल्मी हस्तियों का आस्कॅर में भारतीय फिल्में ना आने, इस समारोह को नकार देना कहीं &#8220;दिल को बहलाने के लिये गालिब ये ख्याल अच्छा है&#8221; जैसी प्रवृति तो नही। जिस समारोह में अन्य देश अपनी फिल्मों को भेजने में ही नही बल्कि उनके जिताने के लिये भी उत्साहित रहते हैं वहीं हमारे असफल रहने की वजह क्या है। क्या हम सिर्फ फिल्में भेज एक खानापूर्ति कर रहे हैं? या ये विचारों का अंतर है कि हमारी पसंद औरों की पसंद से कुछ अलग है? और या ये भारतीय फिल्मकारों की आपसी जलन है जो किसी दूसरे फिल्मकार की फिल्म भेजे जाने में अंदर से शायद उसकी असफलता की ही कामना करते हैं? क्यों ये फिल्मकार &#8220;अंधों में काने राजा&#8221; की तरह विभिन्न भारतीय उधोग घरानों या मीडिया द्वारा चलाये या दिये जाने वाले पुरस्कारों में ही अपनी जीत देखते हैं?</p>
<p>मुझे तो लगता है कि इसकी मुख्य वजह उस भाषा की इज्जत नही करना है जिस भाषा में वो फिल्म बनी है। अगर हिन्दी फिल्मों के कलाकार ही फिल्म के डायलॉग भर बोल के इति समझ लेंगे तो हम कैसे दूसरे विदेशियों से ये आशा करें की वो इन फिल्मो को देखेंगे ही। आप लोगों के विचार आमंत्रित हैं कि आखिर क्या वजह है कि हम आस्कॅर तो एक भी नही जीत पाये लेकिन फैशन की गुडियों की दौड में बहुत कुछ हासिल कर लिया। क्या आस्कॅर का फैशन प्रतियोगिताओं से कम व्यवसायिक पहुँच होना मुख्य वजह हैं? आप अपने विचार मार्च की 31 तारीख तक अपने चिट्ठों में अनुगूँज का लोगो लगा के पोस्ट कर सकते हैं। अनुगूँज के नियम आप <a href="http://akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj">यहाँ पर पढ सकते हैं</a>, अगर नवोदित चिट्ठाकार इस असमंजस में हैं कि ये अनुगूँज क्या बला है तो संक्षेप में इसे समझाऊँ तो कहूँगा कि ये भी एक तरह का टैग ही है जिसमें अलग अलग पांच चिट्ठाकारों को टैग करने के बजाय खुला आफॅर दिया जाता है (यानि की टैग किया जाता है), बजाय पांच सवालों के एक ही विषय दिया जाता है। ज्यादा जानकारी के लिये आप पुरानी अनुगूँज की प्रविष्टियां भी देख सकते हैं। आशा है आप सभी इस अनुगूँज को भी &#8220;पांच सवाल पांच जवाब&#8221; वाले टैग की तरह सफल बनायेंगे।</p>
<p>प्रविष्टि पोस्‍ट करने की अंतिम तिथी है <strong>मार्च 31, 2007</strong>।</p>
<p><strong>नोटः</strong> ये जरूरी नही कि पहली या अंतिम पोस्ट, आयोजित करने वाला सदस्य ही लिखे कोई भी कभी भी लेकिन अंतिम तारीख से पहले लिख सकता है। शुभस्य शीघ्रम् (अंतिम शब्द मुझको गलत लग रहा है)
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2007/02/26/615/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अनुगूँज 22 :हिन्दी के शब्द-संग्रह का आग्रह</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2006/09/01/566/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2006/09/01/566/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 01 Sep 2006 13:32:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>sanjay</dc:creator>
		
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2006/09/01/566/</guid>
		<description><![CDATA[ अनुगूँज का यह मेरा दूसरा प्रयास हैं, और मुझे पूरी आशा हैं मेरे पहले प्रयास की तरह इस बार भी आपका पूरा सहयोग मिलेगा। इससे पूर्व अनुगूँज के तहत सुभाशित संग्रहीत किये गये थे और चुटकुले भी। इसी कड़ी को आगे बढाते हुए इस बार हिन्दी में अनुवाद-सक्षम शब्दों को संग्रहित करने का प्रयास [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img title="अनुगूँज" alt="अनुगूँज" hspace="3" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" align="left" vspace="3" /> अनुगूँज का यह मेरा दूसरा प्रयास हैं, और मुझे पूरी आशा हैं मेरे पहले प्रयास की तरह इस बार भी आपका पूरा सहयोग मिलेगा। इससे पूर्व अनुगूँज के तहत सुभाशित संग्रहीत किये गये थे और चुटकुले भी। इसी कड़ी को आगे बढाते हुए इस बार हिन्दी में अनुवाद-सक्षम शब्दों को संग्रहित करने का प्रयास किया जा रहा हैं। नये चिट्ठाकारों के लिए लिखना चाहता हूँ कि ‘अनुगूँज’ एक ऐसा आयोजन हैं जिसमें आयोजक एक विषय को रखता हैं फिर सभी चिट्ठाकार जो इस विषय पर लिखना चाहते हैं, वे तय समयावधि में अपनी-अपनी प्रविष्टीयाँ अपने चिट्ठो पर लिखते हैं। समय समाप्ति के बाद आयोजक द्वारा सभी प्रविष्टियों की समीक्षा की जाती हैं तथा उसे अक्षरग्राम पर रखा जाता हैं।</p>
<p>इस विषय पर विस्तार से जानकारी <a href="http://akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj" target="_blank">यहाँ</a> पर पा सकते हैं। ‘अनुगूँज’ एक मौका हैं चिट्ठाकारों से परिचीत होने का तथा उनके विचारों को समझने का इसलिए नये चिट्ठाकारों की इसमें विशेष रूप से हिस्सादारी हो ऐसी अपेक्षा रहती हैं। साथ ही साथ उन चिट्ठाकारों से भी अनुरोध करता हूँ जो काफी समय से लिख रहे हैं तथा चिट्ठा लिखना अब उनके लिए एक लत बन गई हैं, वे भी जो हिन्दी चिट्ठाजगत के धुंरधर माने जाते हैं, ‘अनुगूँज’ के लिए प्रविष्टि जरूर लिखे। यह आप द्वारा अन्य चिट्ठाकारों को प्रेरणा देना का कार्य होगा।</p>
<p>अब इस बार की अनुगूँज के विषय-वस्तु के बारे में। संजाल पर इस समय बहुत से अनुवाद कार्य चल रहें हैं। यह काम अधिकतर सेवा के रूप में उन स्वयंसेवको द्वारा हो रहे हैं जो हिन्दी को संजाल पर फैलता हुआ देखना चाहते हैं। सभी प्रकार की अप्लिकेशन या संसाधन जो अभी हम अंग्रेजी में उपयोग कर रहे हैं वे हिन्दी में भी उपलब्ध होने चाहिए तभी वे लोग जो अंग्रेजी का ज्ञान नहीं रखते हैं, भी संजाल का लाभ उठा सके। इस में भाषाकिय सम्मान का मामला तो हैं ही।</p>
<p>वर्तमान में हो यह रहा हैं की किसी एक जगह ही हो रहे अनुवाद में एक ही शब्द के लिए अलग-अलग शब्दो का प्रयोग हो रहा हैं, जो बाद में उल्झन पैदा करेगा। कभी-कभी किसी शब्द के लिए कोई उपयुक्त शब्द न मिलने से भी अनुवाद का कार्य रूक जाता हैं। ऐसे में अच्छा यह रहेगा की हमारे पास शब्दों का एक संग्रह हो जो अनुवादकों के साथ साथ सभी के लिए सुलभ हो। इससे संजाल पर हिन्दी के विस्तार को गति मिलेगी। उदाहरण के लिए <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/Hindi_Computer_Terminology">यहाँ</a> तथा <a href="http://community.livejournal.com/lj_hindi/3871।html" target="_blank">यहाँ</a> भी देख सकते हैं। यहाँ कुछ शब्द एकत्रित किये गये हैं।</p>
<p>अगर यह उलझन हैं की शब्द कहाँ से लाएंगे तो भी आपकी सहायता कर सकता हूँ। आप इस समय अपने ब्राउज़र के ‘toolbar’ यानी उपकरण पट्टी पर नजर डालेंगे तो फाइल से लेकर ‘help’ यानी मदद तक के मेनू हैं। सब शब्दों को एकत्रित कर लें। email यानी ई-पत्र तथा chat यानी बातचीत का उपयोग भी आप करते ही होंगे वहाँ से शब्दो को एकत्र करें। इसके बाद अपने मोबाइल को हिन्दी मोड पर ले जाएं और देखें कौन से हिन्दी के अनुवादीत शब्द आपको उचित नहीं लग रहे हैं फिर उन्हे भी एकत्र कर लें। अब बारी टीवी सेट की हैं वहाँ भी आपको हिन्दी वैकल्पिक भाषा के रूप में मिल सकती हैं सारे मेनू छान मारीये। अब तक आपके पास बहुत से शब्दों का संग्रह हो गया होगा, फिर इनके योग्य हिंदी के विकल्प सोचिये। हिन्दी का न मिले तो स्थानिय भाषा को टटोलिये, वहाँ भी न दिखे तो सीधे अंग्रेजी का ही ले ले और अपनी प्रविष्टी के रूप में लिख दे। किसी ने पहले ही कोई शब्द लिख दिया हैं तब भी चिंता न करते हुए अपने सारे शब्द लिखिए।</p>
<p>तो गुरू, हो जाईये शुरू- आपका समय शुरू होता हैं अब&#8230;
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2006/09/01/566/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अवलोकन: अनुगूँज 20 - नेतागिरी, राजनीति और नेता</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2006/07/09/552/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2006/07/09/552/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 10 Jul 2006 04:13:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>tarun</dc:creator>
		
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2006/07/09/552/</guid>
		<description><![CDATA[जब ये विषय दिमाग में उठा था तो लगा था कि भारतीयों के टाईम-पास में नंबर एक पर राजनीति पर बातें करना ही आता है, इसलिये तुरंत अनुगूँज की घोषणा कर दी। लेकिन बाद में हकीकत पता चली, इसका भी वही हुआ जो चुनाव का होता है यानि 40% से भी कम वोटिंग हुई फिर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जब ये विषय दिमाग में उठा था तो लगा था कि भारतीयों के टाईम-पास में नंबर एक पर राजनीति पर बातें करना ही आता है, इसलिये तुरंत अनुगूँज की घोषणा कर दी। लेकिन बाद में हकीकत पता चली, इसका भी वही हुआ जो चुनाव का होता है यानि 40% से भी कम वोटिंग हुई फिर भी चुनाव संपन्न हुए। <a href="http://www.akshargram.com"><img alt="Anugoonja" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" align="left" /></a> अब चुनाव हुए तो उनका अवलोकन तो होना ही है, तो शुरू करते है अपने से ही। यानि <a href="http://www.readers-cafe.net/nc/?p=66">निठल्ला चिंतन</a> को निहायती निठल्ला समझ सबने खारिज ही कर दिया मतलब कि जमानत ही जब्त हो गई एक वोट को भी तरस गये। इनका कहना सिर्फ इतना ही था कि &#8220;देश की जनसंख्या की तरह बढ़ती राजनीतिक पार्टियों की संख्या की वजह नेता है, राजनीति या फिर नेतागिरी और या फिर तीनों अब ये आप खुद ही अनुमान लगालें।&#8221; लगता है किसी को पसंद नही आया यह कहना कि &#8220;नेता होने के लिये नेतृत्‍व की क्षमता से ज्यादा जरूरी है बाहुबली होना जैसे गडरिया सारी भेड़ों को हाँक के इकठ्ठे करता है चराने के लिये वैसे ही जो चुनाव के वक्त जनता को ट्रकों में भरकर, कुछ लालच दिखा कर चुनाव के बुथ तक हाँक सके वही नेता।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=79">आशीष</a> खाली बैठे तो लाल-पीले हो सबसे पहले पर्चा दाखिल कर दिया, वोट भी अच्छे मिले लेकिन तकनीकि खराबी के कारण उनके पर्चे की डिटेल आप तक नही पहुँचा पा रहा हूँ। फिर आया <a href="http://hindini.com/eswami/?p=82">स्वामिजी</a> का पर्चा, पर्चा भरने से पहले ही उन्हें छट्ठी का दूध याद आने लगा कहने का मतलब है कि बचपन की यादें आने लगी। बड़े चाव से दादाजी का कहा गुरूमंत्र पर्चे में भर सबको बता दिया, कौना सा अरे यही कि &#8220;कोई गुण्डा जब राजनीति के प्राईमरी स्कूल मे होता है तो नेतागिरी करता है, मिड्डील स्कूल में पहुंचने पर राजनीति करने लगता है और हाईस्कूल पास होने वो राजनेता हो जाता है.&#8221; यही नही एक बात और बता गये &#8220;पाकिस्तान के तीन राष्ट्रपिता हैं जिन्ना, नेहरु और गांधी. ये उनका सच था - विभाजन भोगे हुए आम आदमी का सच!&#8221;।</p>
<p>अपने पर्चे का अंत उन्होने किया यह कह के &#8220;मंजा हुआ खिलाडी नेतागिरी या राजनीति नही करता वो नेतृत्व करता है. राजनीति में निपुण व्यक्ति आत्महित साधन तो कर सकता है. नेतृत्व भी कर सके, हमेशा नही होता. इसलिए कहा जाता है की मैनेजर्स गढे जा सकते हैं और नेता पैदा होते हैं. हां ट्रेनिंग या अनुभव दोनों के लिए जरूरी है. मैने देखा की जिस व्यक्ति की नेतृत्व की चाह होती है और उनकी टीमें बार बार बिखरती हैं, उस व्यक्ति की शैली सुधारने से स्थिती सुधर सकती है - ये अनुभव और ट्रेनिंग से संभव है&#8221;।</p>
<p><a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/06/20.html">उन्मुक्त</a> ने तो उन्मुक्त हो कर इतना ही कहा कि &#8220;इस बारे मे मेरे कोई विचार नहीं हैं न ही मै कुछ कह सकता हूं| मेरे जैसे कई और लोग हैं| शायद उन्ही का बहुमत है।&#8221; अब ऐसा कहके कोई चुनाव जीत सकता है भला लेकिन जाने से पहले पते की बात बता गये। &#8220;मुझे आज तक किसी भी न्यायालय की वेब साईट नहीं मिली जिसमे इस तरह की सुविधा उपलब्ध हो| शायद यह न्यायालयों मे इस तरह की सेवा उपलब्ध कराने वाली यह (<a href="http://www.allahabadhighcourt.in/indexhigh.html">इलाहाबाद उच्च न्यायालय कि वेब साईट</a>) पहली वेब साईट है&#8221;।</p>
<p><a href="http://aaina1.blogspot.com/2006/06/20_01.html">आईना</a> वाले जगदीश भाई ने तो शुरूआत ही अपने शौक से करी, &#8220;नेता बनने का मुझे भी शॊंक चढ़ रहा था। मैने शुद्ध गाँधीवादी तरीका अपनाया देश और समाज की सेवा करने का। मैंने सोचा अपनी गली से ही शुरू करना चहिए। गली का सफ़ाई कर्मचारी तो कभी महीने में एक आध बार ही नजर आता है, सुबह सुबह मुँह अंधेरे एक बड़ा सा झाड़ू लिया और लग गया गली की सफ़ाई करने में । रात देर तक इटरनेट पर था। परिचर्चा में जीतु भाई ने बहस छेड़ी थी - ”मेरे सपनों का भारत” और घूमते घूमते बात पहुँच गई कि अच्छे लोग राजनीति में क्यों नही आते? हर कोई यह तर्क दे रहा था कि नेता बनना है तो गुंडागर्दी आनी चाहिए। मगर मेरा मानना है कि हमें एक इमानदार कोशिश करनी चाहिए - निस्वार्थ समाज सेवा। नेतागिरी, राजनीति और नेता तीनों की परिभाषा हमने ही तो बदलनी है।&#8221; अब उनके इस शौक का अंजाम जानने के लिये तो बेहतर होगा कि खुद जाकर एक बार <a href="http://aaina1.blogspot.com/2006/06/20_01.html">आईना</a> देखलें।</p>
<p>पर्चे अभी भरे ही जा रहे थे कि <a href="http://hindini.com/ravi/?p=191">रविजी</a> ने हल्का सा एक छींटा फेंक दिया &#8220;राजनीति सचमुच एक गंदा शब्द हो गया है. अत्यंत गंदा. बदबूदार और सड़ता हुआ. अब देखिए कि इसका नाम आते ही <a href="http://www.akshargram.com/2006/06/10/544/">अनुगूंज और चिट्ठाकारो में</a> सीनियर-जूनियर का लफड़ा पैदा हो गया. अब कोई बताए कि चिट्ठाकारों में कोई सीनियर जूनियर है भी? चिट्ठाकारों का जाति-धर्म है भी? चिट्ठाकार अपने विचारों में भिन्न हो सकते हैं, मानव के रुप में कभी नहीं. उनमें कभी कोई किसी प्रकार का लेबल नहीं लग सकता.&#8221;।</p>
<p>बाद में शायद लगा कि ये छींटा काफी नही इसलिये चलते चलते बौछार ही कर गये &#8220;राजनीति के गंदेपन का एक बढ़िया उदाहरण – पिछली सरकार में ऊर्जा मंत्री थे – सुरेश प्रभु. शिवसेना से सम्बद्ध थे. उन्होंने समूचे भारत में ऊर्जा सुधारों में तीव्रता लाने के लिए बढ़िया काम करने की कोशिशें कीं. पर शिवसेना सुप्रीमो को उनकी कुछ कोशिशें नागवार गुजरीं. प्रभु ने जताया कि ये ऊर्जा सुधार भारत की खुशहाली और लाभ के लिए हैं. सुप्रीमो ने उन्हें राजनीति सिखाई – काम भारत के लिए नहीं शिवसेना की खुशहाली और लाभ के लिए करो. कल शिवसेना नहीं रहेगी तो तुम भी नहीं रहोगे. अंततः प्रभु को ऊर्जा मंत्रालय का बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.&#8221;।</p>
<p>इन्हें छींटे बौछार का फायदा ये हुआ कि अच्छे वोट मिल गये। इस बीच प्रेमलता पांडे ने पर्चा भरने की फर्जी सूचना दे दी ये भी कयास लगाये गये कि हो सकता है कि इन्होने प्रेम की लता पर्चे के चारों ओर लपेट नामांकन ही वापस ले लिया हो। अपना पर्चा भरने आये <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=140">फुरसतिया</a> तो लगता था पर्चा भरने बड़ी फुरसत में आये हैं क्योंकि कहने लगे पहले हमसे ड्राइविंग सीखो तभी आगे की बात करेंगे। जबरदस्त सी ड्राइविंग सीखा लगे कविता करने</p>
<p>&#8220;राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है,<br />
इस मंडी ने सारी मदिरा पी ली है।&#8221;</p>
<p>तब जाकर कही आये मुद्दे की बात पर &#8220;किसी भी देश की नियति को उस देश की राजनीति सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। यह विडम्बना ही रही कि हमारे देश में आजादी के बाद अगर किसी पेशे का सबसे ज्यादा पतन हुआ है तो वह राजनीति का हुआ है। देश की नियति को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले पेशे में देश के सबसे घटिया लोग घुसे हैं।&#8221;</p>
<p>हरिशंकर परसाई के शब्दों को भी बता गये &#8220;हर नेता दूसरे की धोती खींचता है। कुछ तो शुरू से ही सिर्फ चढ्ढी पहने हैं। वे नाडा़ खींचते ही नंगे हो जाते हैं।&#8221; जाते जाते कह गये &#8220;अपने उद्धार के लिये हम देवदूत की तरह नेताओं की बाट जोहते रहे तो पता नहीं देवदूत कब अवतार लें। तब तक हम नेतागिरी का तांडव झेलते रहें-नेतागिरी, राजनीति और नेता को कोसते हुये।&#8221;</p>
<p>हमारी सोच की <a href="http://chhaya-e-shadow.blogspot.com/2006/06/blog-post_12.html">छाया</a> यहाँ मिली &#8220;जब ये विषय देखा तो सोचा कि इस बार तो मै कुछ लिखने से रहा। एक सच्चा भारतीय होने की वजह से लिखने का क्या है, किसी भी विषय पर लिख सकता हूँ, और फिर राजनीति, क्या बात करते हैं साहब। ये तो घर घर पर, मोहल्ले मोहल्ले पर, चौराहे चौराहे पर और पान की हर दुकान पर, बसों में, रेलों में भारत में कहीं भी ये चर्चा तो मिल ही जायेगी आपको। मैने सोचा इस पर तो बीसवीं अनुगूँज में इतने लेख लिखे जायेंगे कि मेरा लेख कौन पढेगा। पर लगता है ज्यादातर चिठ्ठाकार प्रवास में हैं, तो ये बीडा किसी को तो उठाना पडेगा ना। तो साहब प्रयास करता हूँ, गलतियों के लिये शरू में ही क्षमायाचनासहित।&#8221;।</p>
<p>छाया ने ये भी बताया कि &#8220;आम आदमी मतलब वो आदमी जिसके पास वोट है, पर अकल नही है। उसे उल्लू बनाकर वोट निकलवाने का खेल ही राजनीति है। उल्लू बनाने वाला नेता है।&#8221; ये काफी नही था इसलिये ये भी कहा &#8220;चुनाव में धर्म चलता है, जाति चलती है। लोग भेड बकरियों की तरह केवल अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देते हैं, योग्य हो या न हो।&#8221; और &#8220;अब ये देश का दुर्भाग्य ही रहा है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यही सिलसिला जारी रहा है और दारा हमेशा मारे जाते रहे हैं और औरंगजेब हमेशा राज करते रहे। आज भी योग्य उम्मीदवार अपनी जमानत भी नही बचा पाते।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.hindiblogs.com/hindiblog/2006/06/blog-post.html">प्रतीक</a> आते ही मुहल्ले में बच्चों की तादाद की शिकायत करने लगे, &#8220;जब भी बाहर निकलता हूँ तो गिल्ली-डण्डा, कंचे वगैरह खेलते हुए नज़र आ जाते हैं। अभी कल-परसों की ही बात है, हम निकले तो देखा कि दो बच्चे आपस में झगड़ रहे थे।&#8221; हमें लगा कि कहाँ बच्चों की बात लेकर बैठ गये। लेकिन जब आगे बोले तो लग गया कि बात वो नही जो दिख रही थी। &#8220;झगड़े में हाथापाई से पहले वाला चरण होता है गाली-गलौच का, सो दोनों एक-दूसरे को गरिया रहे थे। पहला बच्चा : तू कुत्ता, कमीना @#$%^&amp;*। दूसरा बच्चा : तू विधायक, सांसद, नेता। बस इतना सुनना था कि पहले बच्चे का चहरा ग़ुस्से से तमतमा गया, उसकी मुट्ठियाँ बंध गईं, दाँत भिंच गए और दोनों गुत्थमगुत्था हो गए। ‘नेता’ शब्द गाली होता है, यह तो हम एक अरसे से जानते थे; लेकिन विधायक और सांसद जैसे शब्द भी गाली के अन्तर्गत आ चुके हैं, बच्चों के ज़रिए यह जानकर हमारी जी.के. में भी कुछ इज़ाफ़ा हुआ। ख़ैर, हमने उन्हें अलग करने की कोशिश नहीं की, अब अगर किसी को ‘नेता’ कहा है तो उसके दो-चार घूंसे-झापड़ खाने के लिए भी तैयार रहना ही चाहिए।&#8221;</p>
<p>लेकिन जाते जाते हिन्दुस्तानियों का पुराना रिवाज़ यानि – बातें ज़्यादा काम कम बताना नही भूले। जब थोड़े बहुत लोग जिन्होंने पर्चे भरने थे उन्होंने पर्चे भर दिये तो <a href="http://soniratna.blogspot.com/2006/06/blog-post_30.html">रत्ना</a> अपनी रसोई से कुछ पकवान ले आईं, आप भी चखिये -<br />
&#8220;बापू की प्रतिमा बनवाएं<br />
आदर्शों की बलि चढ़ाएं&#8230;.<br />
बदलें नीति दल और भेष<br />
ऐसे नेता रह गए शेष&#8230;<br />
उमर हमारी बड़ती जाए<br />
तारीख़ अगली पड़ती जाए<br />
निपटे हम, ना निपटे केस<br />
गर्दिश में गाँधी का देश&#8230;..</p>
<p>तो जनाब इस फ्लाप शो में अगर आपमें से किसी का पर्चा रह गया हो तो अपील करना ना भूलें, आपकी अपील में गौर किया जायेगा, लेकिन सनद रहे कि &#8220;तुरंत&#8221; नही कहा गया इसलिये धैर्य का परिचय देना ना भूलें।
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2006/07/09/552/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
		<item>
		<title>अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता</title>
		<link>http://www.akshargram.com/2006/05/29/543/</link>
		<comments>http://www.akshargram.com/2006/05/29/543/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 30 May 2006 02:51:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>tarun</dc:creator>
		
	<category>अनुगूँज</category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.akshargram.com/2006/05/29/543/</guid>
		<description><![CDATA[ क्‍या हुआ? कुछ सुना सा लगता है ये विषय? हो सकता है आप &#8216;लॉयन, ए बिच एंड वार्डरोब&#8217; से कंफ्‍यूज हो रहे हों। तो मैने सोचा जब एक फिल्‍म का नाम ऐसा हो सकता है तो अनुगूँज के विषय का क्‍यों नही। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है आज तक एक ही व्‍यक्‍ति ऐसा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"><img alt="Akshargram Anugunj" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" align="right" /></a> क्‍या हुआ? कुछ सुना सा लगता है ये विषय? हो सकता है आप &#8216;लॉयन, ए बिच एंड वार्डरोब&#8217; से कंफ्‍यूज हो रहे हों। तो मैने सोचा जब एक फिल्‍म का नाम ऐसा हो सकता है तो अनुगूँज के विषय का क्‍यों नही। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है आज तक एक ही व्‍यक्‍ति ऐसा हुआ है जिनके नाम के आगे सम्‍मान के साथ नेता शब्‍द लगाया जाता है और वो हैं &#8216;नेताजी सुभाष चंद्र बोस&#8217;। लेकिन ये भी कमाल की बात है कि उनका राजनीति से ऐसा कुछ लेना देना नही था जैसा कि औरों का है फिर भी नेताजी कह लाये।</p>
<p>इससे ये भी सिद्व होता है कि नेता सिर्फ वो नही जो राजनीति करे। जब पड़ोस के कुछ मवाली किस्‍म के इंसान अपनी मनमानी करते हैं तो आप अक्‍सर कहते हैं कि लोकल दादाओं की दादागिरी से परेशान हैं और अगर ऐसा ही कुछ हमारे चंद नेता करने लगे तो क्‍या कहेंगे यही ना कि नेतागिरी बहुत हो रही है। तो अगर हम देखें तो ये तीनों शब्‍द आपस में एक दूसरे से जुड़े भी हैं और नही भी लेकिन अब देखना ये है कि आप सब लोग क्‍या सोचते हैं। नेतागिरी और राजनीति के बीच में एक <font size="2">थिन</font> लाईन (पतली रेखा) का अंतर है, मसलन मोदी के वीसा का मसला हो या आमीर की फिल्‍म का विरोध ये क्‍या नेतागिरी नही है और शायद आरक्षण का मसला राजनीति हो। आप क्‍या कहते हैं?</p>
<p>बस देर मत कीजिये अपने विचार कागज पर उतारना, माफ कीजिये, मेरा मतलब है वर्डपेड पर उतारना शुरू कर दीजिये और जैसे ही <font size="2">प्रविष्टि </font>पूरी हो जाये अनुगूँज का लोगो लगा कर अपने ब्‍लोग पर पोस्‍ट कर दीजिये।</p>
<p>आशा हैं <a href="http://www.readers-cafe.net"><font size="2">रीडर्स </font>कैफे</a> द्वारा आयोजित इस अनुगूँज में आप सबका सहयोग <font size="2">प्रविष्टियों </font>के रूप में प्राप्त होगा और इसका आयोजन सफल रहेगा। अनुगूँज के नियम आप <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj">यहाँ</a> पढ़ सकते हैं। <font size="2">प्रविष्टि </font>पोस्‍ट करने की अंतिम तिथी है <strong>जून 15, 2006</strong>।
</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRSS>http://www.akshargram.com/2006/05/29/543/feed/</wfw:commentRSS>
		</item>
	</channel>
</rss>
