Posted on अक्तूबर 26th, 2004 द्वारा नीरव
अभी मिले एक सुझाव के आधार पर मैंने ये निर्णय लिया है कि ई-मेल वाला नियम हटा लिया जाय। तो मित्रों, अब आप सीधे १ नवंबर को अपना चिठ्ठा अपने ही ब्लॉग पर प्रकाशित करें, इसलिये अब मुझे (नीरव को) प्रेषित करने की आवश्यकता नहीं…
असुविधा के लिये खेद है।
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Posted on अक्तूबर 25th, 2004 द्वारा नीरव
देबाशीष ने ‘अनुगूँज’ का शंखनाद तो कर ही दिया है। साथ ही मुझे सर्वप्रथम मेज़बानी करने का न्योता दिया, इसके लिये मैं आभार व्यक्त करता हूँ। विषय घोषणा में इस देरी के लिये दो पंक्तियों में स्पष्टिकरण देना चाहुँगाः
प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है,नये परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता […]
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Posted on अक्तूबर 24th, 2004 द्वारा देबाशीष
संचार के विविध माध्यमों से हमें हर रोज़ ढेरों सूचना प्रप्त होती है। इस सूचना और हमारे आसपास की घटनाओं से हमारी राय बनती है। ज़ाहिर है मुक्तलिफ़ राय; हर राय के पीछे अपने वज़हात। राय जो आपकी मौज़ुदा मनःस्थिति, स्थान और आपके अपने खास व्यक्तित्व और सोच के प्रभाव से बनाती है आपकी […]
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Posted on अक्तूबर 21st, 2004 द्वारा अनूप
चाहे देशी हो या परदेसी,निवासी हो अनिवासी,घर में हों या बाहर,नौकरी कर रहें हों या मिल्कियत हम सभी किसी न किसी के अधीन रहते हैं.पुराने जमाने में यह अधीनता राजा की थी.आज यह ‘बास’की है.’बास’ कोई भी हो सकता है.मालिक,सीनियर,पति,पत्नी या वह.
तो राजा से व्यवहार करने का नियम बताये गये है महाभारत में.अक्षरग्राम […]
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Posted on अक्तूबर 20th, 2004 द्वारा पंकज
भाई कविता और छपास की पीड़ा साथ साथ चलती हैं। पहले लोग बाग अपनी कविताओं से दोस्तों को पकाया करते थे अब इंटरनेट से दुनिया के कोने कोने में पहुँच रहे हैं तो लीजिए जनाब आज आप के लिए खास गूगल से खोजी गई सत्येश भंड़ारी का कविता संग्रह प्रस्तुत करते हैं। जरा नीचे […]
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