Posted on जनवरी 31st, 2005 द्वारा विजय ठाकुर
पंकज जी का शुक्रिया गाँव के चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाने का मौका देने का। अब हुक्का तो अपना ही रहेगा पर तमाखू माँगता रहूँगा भाइयों, क्यों क्या खयाल है। अरे हाँ वो क्या कहते हैं मिर्ची सेठ और आलोक भाई ने पूछा था प्रारंभ के छात्रों की हिन्दी में मीन मेख के बारे में, […]
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Posted on जनवरी 30th, 2005 द्वारा पंकज
प्रसिद्धि कौन नहीं चाहता? यदि आपने डेविल्स एडोवोकेट देखी हो तो आप को आखिर का दृश्य जरुर याद होगा जहाँ अल पचीनो कहता है - Vanity is my favorite sin। यहाँ से सुन भी सकते हैं। तो अपने चिट्ठे को प्रसिद्ध कैसे किया जाए के ऊपर वेय्न हरबर्ट जी ने चार प्रविष्टियाँ लिखी हैं। […]
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Posted on जनवरी 28th, 2005 द्वारा पंकज
आज कल आपने देखा होगा कि संजाल और सजाल शब्दों का प्रयोग इक्का दुक्का होते दिख जाता है। मैं इन का प्रयोग कुछ ऐसे करता हूँ। संजाल को Internet की जगह व सजाल को website की जगह। तो website address का बन जाएगा सजालपथ। Internet Surfing का संजाल पर घूमते या मटरगश्ती बन जाएगा। भाई […]
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Posted on जनवरी 27th, 2005 द्वारा ईस्वामी
गाँव वालों,
तो वही हुआ, जो मैने सोचा था, वो कोई और भी सोच चुका था, प्रकृति कभी भी सृजन के मामले मे जोखिम नही लेती - एक से ज्यादा मस्तिष्क एक ही प्रवाह में बहते हैं! नया क्या है?
mp3 feeds can be automated.
तो एक कडी ये लो - प्लग इनं और […]
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Posted on जनवरी 27th, 2005 द्वारा ईस्वामी
कल्पना कीजिये कि आप जो भी अपने ब्लाग पे पेलते हैं वो आपने एक .mp3 मे भी रेकार्ड किया.
अब ऐसी सभी recorded .mp3 की स्ट्रीमिन्ग ठीक उसी तरह आन-लाईन रेडियो के रूप मे कर दो, जैसे हम नये ताज़े RSS Feed दिखा देते हैं चिट्ठा विश्व के माध्यम से. इस के लिये पहले […]
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