नीति

From सर्वज्ञ

कौन हमदर्द किसका है जहां में अकबर । इक उभरता है यहाँ एक के मिट जाने से ॥ — अकबर इलाहाबादी

हथौड़ा कांच को तो तोड़ देता है, परंतु लोहे को रूप देता है.

तलवारों तथा बंदूकों की आँखें नहीं होती हैं.

मुट्ठियां बाँध कर आप किसी से हाथ नहीं मिला सकते | -– इंदिरा गांधी

कांटों को मुरझाने का डर नहीं सताता.

रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिये डारि। जहाँ काम आवै सुई काह करै तरवारि।। —–रहीम

कह रहीम सम्पत्ति सगे , मिलत बहुत बहु रीति । बिपति-कसौटी जे कसै , सोई साँचे मीत ॥

कह रहीम कैसे निभै , बेर केर को संग । वे दोलत रस आपने , उनके फाटत अंग ॥

बसि कुसंग चाहत कुशल , यह रहीम जिय सोस । महिमा घटी समुद्र की , रावन बस्या परोस ॥

खैर खून खाँसी खुशी , बैर प्रीति मद पान । रहिमन दाबे ना दबे , जानत सकल जहान ॥

बिगरी बात बने नहीं , लाख करो किन कोय । रहिमन फाटै दूध को , मथे न माखन होय ॥

केवल वीरता से नहीं , नीतियुक्त वीरता से जय होती है । अन्य वस्तु के साथ मिलाकर विष खाने से लाभ होता है , लेकिन अकेले खाने से मरण ।

बलीयसा समाक्रान्तो वैंतसीं वृतिमाचरेत । — पंचतन्त्र ( बलवान से आक्रान्त होने पर मनुष्य को बेंत की रीति-नीति का अनुपालन करना चाहिये, अर्थात नम्र हो जाना चाहिये । )

कुल की प्रतिष्ठा भी विनम्रता और सदव्यवहार से होती है, हेकड़ी और स्र्आब दिखाने से नहीं । — प्रेमचंद

आंख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता । –चाणक्य

जहां प्रकाश रहता है वहां अंधकार कभी नहीं रह सकता । — माघ्र

जो दीपक को अपने पीछे रखते हैं वे अपने मार्ग में अपनी ही छाया डालते हैं । –रवीन्द्र

जहाँ अकारण अत्यन्त सत्कार हो , वहाँ परिणाम में दुख की आशंका करनी चाहिये । — कुमार सम्भव

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