परोपकार

From सर्वज्ञ

परहित सरसि धरम नहि भाई । — गो. तुलसीदास

अष्टादस पुराणेषु , व्यासस्य वचनं द्वयम् । परोपकारः पुण्याय , पापाय परपीडनम् ॥

अट्ठारह पुराणों में व्यास जी ने केवल दो बात कही है ; दूसरे का उपकार करने से पुण्य मिलता है और दूसरे को पीडा देने से पाप ।

पिबन्ति नद्यः स्वमेय नोदकं , स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः । धाराधरो वर्षति नात्महेतवे , परोपकाराय सतां विभूतयः ।। ——-अज्ञात (नदियाँ स्वयं अपना पानी नहीं पीती हैं। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं। बादल अपने लिये वर्षा नहीं करते हैं। सन्तों का का धन परोपकार के लिये होता है ।)

जिसने कुछ एसहाँ किया , एक बोझ हम पर रख दिया ।

सर से तिनका क्या उतारा , सर पर छप्पर रख दिया ॥ — चकबस्त

समाज के हित में अपना हित है । — श्रीराम शर्मा , आचार्य

जिस हरे-भरे वृक्ष की छाया का आश्रय लेकर रहा जाए, पहले उपकारों का ध्यान रखकर उसके एक पत्ते से भी द्रोह नहीं करना चाहिए। - महाभारत

नेकी कर और दरिया में डाल। —-किस्सा हातिमताई(?)

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