संगति

From सर्वज्ञ

संघे शक्तिः ( एकता में शति है )

हीयते हि मतिस्तात् , हीनैः सह समागतात् । समैस्च समतामेति , विशिष्टैश्च विशिष्टितम् ॥

हीन लोगों की संगति से अपनी भी बुद्धि हीन हो जाती है , समान लोगों के साथ रहने से समान बनी रहती है और विशिष्ट लोगों की संगति से विशिष्ट हो जाती है । — महाभारत

यानि कानि च मित्राणि, कृतानि शतानि च । पश्य मूषकमित्रेण , कपोता: मुक्तबन्धना: ॥

जो कोई भी हों , सैकडो मित्र बनाने चाहिये । देखो, मित्र चूहे की सहायता से कबूतर (जाल के) बन्धन से मुक्त हो गये थे । — पंचतंत्र

को लाभो गुणिसंगमः ( लाभ क्या है ? गुणियों का साथ ) — भर्तृहरि

सत्संगतिः स्वर्गवास: ( सत्संगति स्वर्ग में रहने के समान है )

संहतिः कार्यसाधिका । ( एकता से कार्य सिद्ध होते हैं ) — पंचतंत्र

दुनिया के अमीर लोग नेटवर्क बनाते हैं और उसकी तलाश करते हैं , बाकी सब काम की तलाश करते हैं । — कियोसाकी

मानसिक शक्ति का सबसे बडा स्रोत है - दूसरों के साथ सकारात्मक तरीके से विचारों का आदान-प्रदान करना ।

शठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधातु सुहाई ॥ — गोस्वामी तुलसीदास

गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा । ( हवा का साथ पाकर धूल आकाश पर चढ जाता है ) — गोस्वामी तुलसीदास

बिना सहकार , नहीं उद्धार ।

उतिष्ठ , जाग्रत् , प्राप्य वरान् अनुबोधयत् । ( उठो , जागो और श्रेष्ठ जनों को प्राप्त कर (स्वयं को) बुद्धिमान बनाओ । )

नहीं संगठित सज्जन लोग । रहे इसी से संकट भोग ॥ — श्रीराम शर्मा , आचार्य

सहनाववतु , सह नौ भुनक्तु , सहवीर्यं करवाहहै । ( एक साथ आओ , एक साथ खाओ और साथ-साथ काम करो )

अच्छे मित्रों को पाना कठिन , वियोग कष्टकारी और भूलना असम्भव होता है। — रैन्डाल्फ

काजर की कोठरी में कैसे हू सयानो जाय एक न एक लीक काजर की लागिहै पै लागिहै। —–अज्ञात

जो रहीम उत्तम प्रकृती, का करी सकत कुसंग चन्दन विष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजंग । — रहीम

जिस तरह रंग सादगी को निखार देते हैं उसी तरह सादगी भी रंगों को निखार देती है। सहयोग सफलता का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। –मुक्ता

एकता का किला सबसे सुरक्षित होता है। न वह टूटता है और न उसमें रहने वाला कभी दुखी होता है । –अज्ञात

अच्छे लोगों की संगति करो। ऐसा कभी मत समझो कि अब तो देर हो गई।

जो रहिम उत्तम प्रकृती का करी सकत कुसंग चंदन विष व्याप्त नहीं , लिपटे रहत भुजंग - रहिम

मिट्टी गुणानुसार ज्यों, बदले वारि-स्वभाव । संगति से त्यों मनुज का, बदले बुद्धि-स्वभाव ॥ -सन्त तिरुक्कुरळ

ओछों से डरना रहा, उत्तम जन की बान । गले लगाना बन्धु सम, है ओछों की बान ॥ -सन्त तिरुक्कुरळ

मन की शुद्धि मनुष्य को, देती है ऐश्वर्य । सत्संगति तो फिर उसे, देती सब यश वर्य ॥ -सन्त तिरुक्कुरळ

शुद्ध चित्तवाले स्वतः, रहते साधु महान । सत्संगति फिर भी उन्हें, करती शक्ति प्रदान ॥ -सन्त तिरुक्कुरळ

चित्त-शुद्धि परलोक का, देती है आनन्द । वही शुद्धि सत्संग से होती और बुलन्द ॥ -सन्त तिरुक्कुरळ

साथी कोई है नहीं, साध- संग से उच्च । बढ़ कर कुसंग से नहीं, शत्रु हानिकर तुच्छ ॥ -सन्त तिरुक्कुरळ

मन की होना शुद्धता, तथा कर्म की शुद्धि । दोनों का अवलंब है, संगति की परिशुद्धि ॥ -सन्त तिरुक्कुरळ

गुरु संगति गुरु होइ सो लघु संगति लघु नाम । तुलसी गुरु लघुता लहत लघु संगति परिनाम । -तुलसी

एक घड़ी ,आधी घड़ी, आधी में पुनि आधि, तुलसी संगति साधु की हरै कोटि अपराध। -तुलसी

जब मुझमें थोड़ा ज्ञान था तो मैं मतवाले हाथी की भाँति अन्धा हो गया और मेरे मन ने स्वयं को सर्वज्ञ समझ लिया। जब मैंने विद्वानों की संगति से कुछ-कुछ ज्ञान प्राप्त किया तब मैंने अपनी अल्पज्ञता का अनुभव किया और मेरा अहंकार ज्वर की भाँति उतर गया।। वनचारी जन्तुओं के साथ दुर्गम पर्वतीय स्थानों और जंगलों में रहना अच्छा है। परन्तु इन्द्रभवन में भी मूर्खों के साथ रहना कल्याणप्रद नहीं है।। - भर्तृहरि

सत्संगति बुद्धि की जड़ता हरती, सत्य कहलवाती, मान बढ़ाती है और पाप को दूर करती है। चित्त को प्रसन्न करती और दिशाओं में यश फैलाती है। इस प्रकार सज्जन पुरुषों की संगति मनुष्यों का क्या नहीं करती।। - भर्तृहरि

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