सर्वज्ञ:सहायता

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 मेरी ग़ज़लें    
          डॉ.सुभाष भदौरिया, अहमदाबाद.
    ग़ज़ल 1
             
          

वो न आया दुबारा शहर दोस्तो . लग गई उसको किसकी नज़र दोस्तो.

उसको पिंजड़े में रहना गवारा न था कट गये इसमें ही उसके पर दोस्तो ।

ग़ैर तो ग़ैर उनका गिला क्या करें, अपनों ने भी कहां की क़दर दोस्तो.

धूप में रह के जो छांव देता रहा, मिल के काटा सभी ने शजर दोस्तो.

जान के क्यों सभी उसके प्यासे हुए. पास था उसके कोई हुनर दोस्तो.

दुश्मनों की गली से तो बच जायेगा, उसको खतरा है अपने ही घर दोस्तो .

आओ मिस काल करके ही पूछे उसे, हो रही उसकी कैसे गुज़र दोस्तो .

   ग़ज़ल2

बेवफ़ाई के किस्से सुनाऊँ किसे . बात घर की है अपनी बताऊँ किसे.

कौन दुनियाँ मैं अपना तलबगार है, फोन किसको करूँ मैं बुलाऊँ किसे.

दूध का मैं जला छाछ से भी डरूं, प्यास अपनी जहां में दिखाऊँ किसे .

रूठने और मनाने के मौसम गये, किससे रूठूं मैं अब, मैं मनाऊँ किसे.

शाख पर मेरी फल आगये इन दिनों, खुद ही झुक जाता हूं अब झुकाऊँ किसे .

उसको महलों में रहने की आदत पड़ी, झोपड़ी अपनी अब मैं दिखाऊँ किसे .

आँसुओं की सौगात मुझको मिली, खुद ही रो लेता हूं अब रुलाऊँ किसे .

          subhash_bhadauriasb@yahoo.com
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