Shishugeet

From सर्वज्ञ

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[edit] शिशु-गीत

[edit] सरस्वती-वंदन

हे माता शारदे ! हमारा ,
वंदन नित स्वीकार करो ।
हम नन्हे-मुन्नों को अपना,
आशिष दो और प्यार करो ।

-- देवेन्द्र शर्मा

[edit] मछली जल की रानी

मछली जल की रानी है,
जीवन उसका पानी है ।
हाथ लगाओ, डर जायेगी,
बाहर लाओ, मर जायेगी ।

[edit] आलू-कचालू

आलू-कचालू बेटा कहाँ गये थे,
बैगन की टोकरी मे सो रहे थे ।
बैगन ने लात मारी, रो रहे थे,
मम्मी मे प्यार किया, हँस रहे थे ।

[edit] गोल-गोल पानी

गोल-गोल पानी,
मम्मी मेरी रानी ।
पापा मेरे राजा,
फल खाएँ ताजा ।
सोने की चिडिया ,
चाँदी का दरवाजा ।
उसमे कौन आयेगा ?
मेरा भैया राजा ।

[edit] चूहा

वह देखो, वह आता चूहा ,
आँखों को चमकाता चूहा ।
मूँछों में मुस्काता चूहा ,
लम्बी पूँछ हिलाता चूहा ।
मक्खन-रोती खाता चूहा,
बिल्ली से डर जाता चूहा ।
-- निरंकारदेव सेवक

[edit] काठ का घोडा

काठ का घोडा, काठ के जीन,
उस पर बैठे लंगड दीन ।
कोडा खूब चलाते हैं,
रह-रह एड लगाते हैं ।
कहीं न आते-जाते हैं ,
झूम-झूम रह जाते हैं ।
-- हरिबंशराय बच्चन

[edit] मेरी नानी

मेरी नानी कितनी भोली,
हँसमुख चेहरा, मीठी बोली ।
हरदम पूछे सबका हाल,
नानी जियो हजारों साल ।
-- गीता सैली

[edit] गिनती गीत

एक दो तीन चार,
मन में रखना उच्च-विचार ।
चार पाँच छः सात,
हरदम करना मीठी बात ।
सात आठ नौ दस,
पढ-लिख करके लेना जस ।
-- देवेन्द्र शर्मा

[edit] बन्दर मामा

बन्दर मामा पहन पाजाम,
दावत खाने आए ।
ढीला कुर्ता, टोपी, जूता,
पहन बहुत इतराए ।
रसगुल्ले पर जी ललचाया,
मुँह मे रक्खा गप से ।
नर्म-नर्म था, गर्म-गर्म था,
जीभ जल गयी लप से ।
बन्दर मामा रोते-रोते,
घर को वापस आये ।
फेंकी टोपी, फेंका जूता,
रोये औ' पछताए ।

[edit] तितली रानी

तितली रानी ! कहाँ चली ?
फर-फर करती कहाँ चली ?
क्यों नखरे दिखलाती है ?
क्यों इतना इतराती है ?
उपर बदली छाएगी,
हवा तेज लहराएगी ।
धक्के-वक्के खाएगी,
झटके खा गिर जाएगी ।
तितली रानी ! अन्दर आ,
कहीं न पड जाए बरखा ।
अगर न अन्दर आएगी,
भीग-भीग मर जाएगी ।
-- देवेन्द्र शर्मा

[edit] धम्मक-धम्मक आता हाथी

धम्मक-धम्मक आता हाथी ,
धम्मक-धम्मक जाता हाथी ।
अपनी सूँढ उठाता हाथी,
अपनी सूँढ गिराता हाथी ।
अपने कान झुलाता हाथी,
अपनी पूँछ हिलाता हाथी ।
धम्मक-धम्मक आता हाथी ,
धम्मक-धम्मक जाता हाथी ।
-- प्रयाग शुक्ल

[edit] तिरंगा

तीन रंग का प्यारा झण्डा,
लहर-लहर लहराये झन्डा ।
आओ, इसको शीश झुकाएँ,
जन-गण-मन का गाना गाएँ ।
-- नरेश पण्डित

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